अख्लाकी

कहानियां

तीसरा हिस्सा

'सम्पादनः अफृजल हुसैन एम. ए. एल. टी.

अनुवाद :

नसीम गाजी फंलाही

क्‍या

- अच्छा सुलक 00

साठगी 0

हिम्मत

हराम से परहेज मेहनत की कमाई [0

: « मांगने से बचो 7

* बेतकल्लुफ़ी ज़िम्मेदारी का अहसास 0

बेटे के लिए करवानी: 0 '

एहतियात 0

अमन की कोशिश 0

. - सब्र

पड़ोसी का हक्‌ 0 मेहमान की खातिरदारी 0 कितने ईमानदार थे ! 0

बहादुरी 0.

तड़क-भड़क कपड़ों से बचो

"लोगों की भलाई के काम 0 ेल्‍

बिस्मिल्लाहिर्रहसानिर्रहीम हि शुरू अल्लाह-रहमान, रहीम के नाम से”

अच्छा सुलक

हिन्दुस्तान के मुसलमान बादशाहों में से एक का नाम नासिरुद्दीन था। वह बहुत ही नेक और नर्म मिजाज का बादशाह * था। सरकारी खजाने से अपने निजी खर्च के लिए एक पैसा भी नही लेता था। जिन्दगी गृज़ारने के लिए उसने सुलेख (खुश नवेसी) को जरिया बनाय्रा था ।.कुरआन पाक और दूसरी किताबें लिख कर उनकी आमदनी से अपने खर्च पूरे करता था। एक बार की बात है . कि कोई रईस आपसे मिलने आया। . आप ने हाथ का खूबसूरत लिखा हुआ एक कुरआन पाक दिखाया रईस उसे देख कर बहुत ख़ुश हुआ | गौर से देखता रहा, फिर बोला, “इसमें कछ गलतियां हैं, इन्हें. ठीक कर लीजिएगा।” ,* “रईस की निकाली हुई ग़लतियां हकीकत में ग़लतियाँ थीं, फिर भी नांसिरुद्दीन ने बिल्कुल बुरा माना, बल्कि मुस्करा कर उसका बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया उसने जिन ग़लतियों की तरफ इशारा किया था, उनको घेर दिया कि बाद में ठीक कर ली जाएंगी उस वक़्त जो लोग मौजूद थे, वे बादशाह का यह अछ्लाक़ - दिखकर दंग रह गए रईस के चले जाने के बाद बादशाह ने सब 'घेरे मिटा दिए। लोगों ने वजह पूछी, तो बादशाह ने कहा-- / . "ुझेमालूम था कि गलती कोई नहीं है। लेकिन मैं अपने

आओ

मेहमान को शर्मिन्दा करना या उसका दिल दुखाना नहीं चाहता था, इसीलिए अपनी ग़लतियां मान करके उनको घेर दिया था अब वे घेरे मिटा दिये गये |” -

बादशाह के इस अच्छे बंतांव से दरबारियों पर बहुत असर हुआ | उन्हें ताज्जब था कि इतने बड़े बादशाह ने एक मामली रईस का दिल रखने के लिए ऐसा सुलक किया।

सबाल :

१. नासिरुद्दीन कैसा बादशाह था? उसमें कौन-कौन सी ख़ूबियाँ थी? २. उसने ग़लतियां होने पर भी शब्दों को क्‍यों घेर दिया था?

सादगी

.._ हज़रत सलमान (रजि०) एक-बड़े सहाबी हुए.हैं वे ईरान के , रहने वाले थे। उनके बाप उनसे बड़ा प्रेम करते थे लड़कियों की तरह घर से बाहर जाने देते थे बचपन से ही दीन की ख़िदमत की उनके मन में बड़ी उमंग थी श्रू में वे आग की पूजा करते थे। एक वार ऐसा हुआ कि जायदाद की देख-भाल के लिए उनके बाप ने उन्हें गाँव भेजा|। रास्ते में एक गिरजा मिला, उसमें उस समय नमाज हो रही थी। उससे उन पर बहुत असर पड़ा। अब उन्हें सच्चे दीन की खोज हुई एक काफिले के साथ चुपके से शाम - पहंचे | इंसाई पादरियों के साथ रहने-सहने लगे मगर वहां उन्हें सकन' मिला वे पांदरियों के मुंह से अरब में आखिरी नबी के आने की ख़बर सना करते थें। उन्हें उसी नबी का इन्तजार था है शक बार एक अरबी क़ाफ़िले से मुलाकात हुई। उन्होंने अपनी सब गाय-बकरियाँ जो पाल रखी थीं, उसे क़ाफ़िले के हवाले कर दीं। और कहा :- “मुझे इसके बदले तुम अपने शहर ले चलो '' वे उनको अपने साथ ले आये, मगर छल कर उनको गुलाम वना लिया और एक यहूदी के हाथ बेच दिया.। अब बेचारे पाबन्द हो गयें नबी (सल्ल०) की खिदमत में हाजिर हो सके नवी (सल्ल०) जब हिजरत करके मदीना पहुंचे तो, इत्तिफाक़ से वह भी एक आदमी के हाथ बिक कर मदीना आये यहाँ नबी(सलल्‍ल०) की ख्थिदमत में पहुंचे और उन्हें जांच परख कर मुसलमान हो गये

के

. नबी [सल्ल०) ने उन्हें गुलामी से भी आजाद करा दिया। हज़रत उमर (रज़ि०) के समय में वे मदाइन के गवर्नर हुए

* सालाना पांच हज़ार दीनार उनको तनख़्वाह मिलने लगी। लेकिन...

जब सरकारी खजाने से पैसा मिलता-तो वे उसे ग़रीबों और महताजों में बांट देते और ख़ुद चटाई बुनकर रोजी कमाते उन्होंने अपने लिएं घर नहीं बनवाया, पेड़ों और दीवारों की छाया. में पड़े रहते एक प्याला और एक लोटा यही हमारे गवर्नर का कूल सामान था . इस पर भी यह हाल था कि जब मरने का समय आया तो इन चीज़ों .. . को देखकर रोते थे। उन्हें यह भी बोझ मालूम होता था।

सवाल हे १. हजरत सलमान (रजि०) कौन थे? वह मदीना किस तरह आये? «२. उन्होंने इस्लाम किस तरह कूबूल किया? '

. ३. गवर्नरी मिलने पर उनका रहन-सहने कैसा था?

हज़रत- उस्मान (रजि०) की ख़िलाफ़ंत के समय की बात है . ड्रोमियों से एक बार लड़ाई हुई मसलंमांनों की तरफ़ से मिस्र के - गवनर को फ़ौज का. कमान्डर बना. दिया गया। वे बीस हजार * म॒जाहिदों की.फ़ौ्ज लेकर रवाना हुंए 4 रोमियों-की फ़ौज में लगभग

- , दो लाख फौजी थे। बड़ी घमासान की लड़ाई हुई लड़ाई हो ही रही . शथ्री। कि रूमी फौज के कमान्डर ने ऐलान किया कि मुसलमानों के - कमान्डर को जो- कृत्ल करेगां, मैं उससे अपनी बेटी की शादी कर

दंगा.) और एक लाख:दीनार इनाम में दंगा! 7“

_. मुंसलमानों-ने जब यह ऐलान सना, तो उनमें से कछ तो घब्बरा

* गए हजरत अब्दुल्लाह बिन जुबैर (रजि०) भी मुजाहिदों में मौजूद

थे। उनकी उम्र ज़्यादा थी। मग़र वे बड़े ब्रह्दुर-और साहसी थे। ."-

. उनको जब ख़बर हुई तो बोले, ''इसमें घबराने की क्या बात है।

, हमारी-तरफं से भी ऐलान किया जाय.कि जो मुजाहिद भी रूमी , . क्रमान्डर को कत्ल-करेगा, उसकी शादी उसी कंमान्डर की बेटी से - कर दी जाएगी औरं एक लाख दीनारं के अलावा उसे उन शहरों

: का अपर भी बना दिया जाएगा, जो रूसी कमान्डर के कब्जे में हैं.

बहरहाल बड़ी देर तक मुकाबला होता रहा जंग के बीच में : हजरत अब्दुल्लाह की निगाह रूमी कमान्‍्डर पर पड़ी, वह अपनी

दर

फ़ौज के पीछे था और दो दासियां मोरछल का साया किए हुए थीं उन्होंने जब उसका यह हालःदेखा तो उसकी बज़दिली का अन्दाजा लगा लिया। उसे ग्राफ़िल पाकर वह आगे बढ़े, फौज से हटकर अंकेले बढ़ते चले गये और जा कर हमला कर ही दिया। वह समझता रहा कि यह अकेले बढ़ते चले रहे हैं, शायद समझौते : का पैग़ाम.ला रहे हों वरना, अकेले बढ़ने की हिम्मत एक्र कम उम्र आदमी को कैसे हो सकती है।

उन्होंने हमला करके तलवार से उसका सिर 'काट लिया और ब्छें पर उठा कर ले. आये, सारे फ़ौजी देखते*रह गये।

सवाल * १. रूमी कमान्डर ने क्या एलान किया था? उस एलान का क्‍या असर हुआ। २. हजरत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर ने क्‍या क्रिया? ३. वे सरदार की' बुज़दिली को कैसे ताड़ गये थे?

हराम- से परहेंज.

हजरत. अबूबक्र (रजि०) का एक़.गुलाम-था वह उसे इसका -

, मौका देते कि वह कंछ कमा लिया करे। वह क़मा कर लाता औरे

प्राबन्दी से अपंनी कमाई कां'कछ हिस्सा हजरत अबूंबक्र के लिए भी

* निक़ालता था।. उसकी आप॑ अपने खर्च में लाते। ' एक दिन गुलाम को कमाई में खाने की कोई चीज मिली , उसने पंहले- की तरह उसका”भी एक.हिस्सा 'हज़रत अब्ूबक्र

है है . (रजि०).को पेश' किया। आपने खानो शुरू किया तो गुलाम

बोला<. * :+. : /यह-जो आप, खा रहे हैं; क्या इसके बारे में आपको मालूम है

+ * कि, यह.मुझे-किस तरह हासिल हुआ है?” *'

मुझे क्या पता हजरते अबू बक्र (रज़ि०) ने-कहा बताओ क्या बात है? गुलाम बोलां- “मैंने इस्लाम .कूबूल करने से पहले एक आदमी के लिए फाल निकाली थी फ़ाल निकालना तो मैं-जानता नें था, सिर्फ. धोखा दिया था; आज वह आदमी मिला और उसने फ़ाल

* » देखने के बदले में यह चीज दी, ज़ो आप: खा रहे हैं।” ,

आप ने यह.स॒ना तो चेहरा बदेल गया, उठे और जो कछ खाया

था, हलक में उंगली डाल कर सब कै कर दी -तम ही सोचो हराम

' की कंमाई से हासिल की हुई चीज वह गले के नीचे कैसे उत्तारसकते - बे? | $+ छ#९ -पढः

मेहनत की कमाई _

एक बार की बात है प्यारे नबी (सलल०) बैठे हुए थे ।.इतने में एक सहाबी हाजिर हुए सलाम किया, प्यारे नबी (सल्ल०) बंड़े . तपांक से मिले। आप (सल्ल०) अपने साथियों से बड़ा प्रेम. करते थे। हाथ पकड़ कर बिठाने चले तो-देखा कि हाथ' काले पड़े हुए हैं।.' * आपने बड़ी हैरत से पूछा “क्यों भाई! क्‍या तुम्हारे हाथ पर कछ लिखा हुआ है? ये काले-काले निशान कैसे हैं?'' '. . उन्होंने कहा, “नहीं ह॒ज्र! यह बात नहीं है। असल में: अपने * बाल-बच्चों का पेट पालने के लिए मैं पत्थर पर फावड़ा चलाता हूं, उसी की मजदूरी से हमारा गुज़र-बसर होता है फाबंड़ा चलाने'की * बंजह से मेरे हाथ. काले. पड़ गये-हैं, यह सब घट्टों के निशान हैं, कछ . . लिखा नहीं है।” . / गा हि सहाबी की. बात सुनकर ह॒जूर (सलल०) बहुत खुश हुए और - , : उत्तका हाथ चूम लिया और ऐसा क्‍यों होता, यह कितनी खुशी की * बात थी कि एक गरीब आदमी है, किसी के आंगे हाथ नहीं फ़ैलाता ।5 -धोखा-धड़ी .और बेईमानी से पैसे नहीं कमाता, बल्कि

मेहनत-मज़दूरी करके अपना और अपने बाल-बच्चों का पेट

पालता हैं और इतनीं मेहनत करता है कि हाथ काले पड़ जाते हैं प्यारे.नबी की निगाह में यह बात बहुत ही पंसन्दीदा थी,-इसीलिए तो आप. (सल्‍ल०) ने हाथ चूम लिया।....*

१्‌ लड़ 2

970 मांगने से बचो.

|. इन्सान-को अल्लाह ने बड़ा ऊंचा दर्जा दिया है, उसे अपना, खलीफ़ा बनाया है दुनिया भर का सामान दिया है भला इन्सान .

, को ग्रह.बात कब शोभा (जेंब) दे सकती है. कि वह दूसरों के सामने ' हाथ फैला कर अपना अपमान करे | इसी लिए प्यारें नबी (सलल०) अपने साथियों को बड़ा खुद्दार बनाना चाहते थे, ताकि वे अल्लाह के -

. हक्‍्मों. का ठीक-ठीक हक़ अदा कर सकें ! हि

- . एक बार की बांत हैं कि. कुछ सहाबी प्यारे नबी: (सलल०) के - पास पहुँचे | ये लोग नये-नये मुसलमान हुंयें थे आप (सल्ल०) ने उनके सामने- जहां और.बहत सी शर्तें रखीं; वहीं एक शर्त यंह भी

' थी कि तुम किसी से.सवाल नहीं करोगे क़िसी से कछ मांगोगे

नहीं।'

«. सहाबां (रजि०) इस बात पर सख्ती, से अमल करते थें, यहां *

तक कि अगर॑ सवारी परें जा रहे होते और.कोड़ा नीचे गिर जाता तों*'

, 'साथ के पैदल चलने वालों से यह कहना. भी पंस़नद करते थे कि. "भाई! ज़रा मेरा कोड़ा उठा देना / बल्कि खुद ऊंट को ब्रिठा कर .* कोड़ा उठा लेते। . हे

एक, बार.की. बात*है, हज़रत अबूबक्र ऊंटनी पर सवार कहीं| / जा रहे थे। इत्तिफ़ाक से लगाम हाथ से छूट कर नीचे गिर गई आप ने ऊंटनी को बिठाया, उतर'कर लगाम हाथ में ली और फिर - .

रवाना हुए लोगों ने कहा, हजरत! आप ने क्‍यों तकलीफ की?” * हम लोग तो मौजूद ही थे, हमसे क्यों कहा? यह कौन सी बड़ी बात थी हम उठा देते?” आप ने फ़र्माया | हु सकत होते हंए भी किसी से मांगना मोमिन को जेब नहीं देता मैंने अपने दोस्त हजरत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सलल०) से अहद | * कियां था कि किसी से कछ मागुंगा।'

सवाल

१. खुद्दारी को ठेस सबसे ज़्यादा किस बात से लगती है?

२. हजूर (सलल०) अपनी उस्मत को क्‍या देखना चाहते. थे? -

३. भीख मागना किसी मोमिन की शान के खिलाफ क्‍यों है?

* ४. हजरत अबूबक्र .(रजि०) ने ऊंटनी बिठा कर खुद कोड़ो क्यों उठाया? . ४. साथियों की बात का उन्होंने क्या जवाब दिया?

६. इस सबक से क्या नसीहत मिलती है? *

१३

बे-तकल्लफी चंचा सादी-(रह०) बहुत बड़े आलिम और फ़ारसी के अच्छे ,

शायर थे रहने वाले-तों शीराज़ के थे, परन्त तालीम हासिल करने

के लिए बंड़ी दूर-दूर तंक का सफर किया. बहुत सी जुबानें सीखीं |... ,

भारेत में'भी आये थे.।. उन्होंने बहुत सी किताबें लिखी हैं, ज़िंनमें . गुलिस्तां; बोस्तां, मंशहूर हैं सह

.''. एक बार चचा-.सादी सफ़र. करते-करते किसी शहर में पहंचे : वहां उनके एंक दोस्त थे। वे अपने द्वोस्त के यहां ठहरे। दोस्त ने बड़ी ख़ातिरें की चचा के लिए अच्छे-अच्छे खाने पकवाये, जब. . खाना सामने आया, तो, चंचा बोले :-

हाय॑ दावते शीराजं * -* यह संनकंर उनके दोस्त को बड़ा ताज्जुब हुआ; सोचा शायद

शीराज की दावत-बड़ी अच्छी होती होगी. इसलिए.अगले दिन उसने . .. ' और ज़्यादा अच्छी दावत की। अच्छे*से-अच्छे खाने पकवाये, - ,'परन्तु.जब दंस्तरखान लगवाया गया. तो चंचा ने फिर वही बातः . दुहराई.।. पं हाय दावते शीराज. : #.. - बता पी

अपने दोस्त का यह.तंकल्लफ़ और एहतमाम देखकंर चचा बहत * ,ज़्यादां-न.ठहरे और्‌जल्दी'ही चले गये। (7 “-,. कुछ दिनों बाद वहीं दोस्त शीराज आये और चर्चा सादी के

' यहां ठहरे। सोचा.अब ''दावते शीराज' देखेंगे, जिसके लिए सादी कप आह भरा क़रते थे चंचा सादी अपने दोस्त से मिले तो बड़े तपाकः 5 *'

से और उनके आने पर खुशी भी.जांहिर की मगर जब खाने का

» समय आया:तो-वही रोज की दाल रोटी लाकर सामने:रख दी और:

बोले :-- “ब्रिस्मिल्लाह, -खाइये ।“':और खुद भी शौक से खांने .* 'लगे॥ 7 पड *./ दोस्त को बड़ा ताज्जुब चचा खद बोल उठे :८ कि, हें भई, वृहां जो मैंने दावते-शीराज के लिए आह भरी: थी... उसका मतलब.यहं था कि दावत में तंकल्लुफ़ बरता.जाय, ताकिं...

मेहमान आकर चाहे कितने दिन ठहरे! मेजबान को बोझ मालम. * .

. हो आपका खाने. का :इन्तज़ाम. और तकल्लफ़ देखकर मुझे दं:ख.. हुआ,. इसलिए चाहते- हुए. भी, आप्रंके पास ज़्यांदो. दिनों ठहेर' "सका।

जिम्मेदारी का एहसास

हज़रत उमर (रजि०) मुसलमानों के ख़लीफ़ा थे। खलीफा

का फर्ज है कि वह सबकी देख-रेखे करे आप अपना फर्ज बेब -

समझते थे, इसीलिए आप उसे पूरा करने के लिए बड़ी मेहनत करते

. थे। दिन-रात एक कर देते थे, दिन में तो .आप अपना फर्ज निभाने: *

में लगे ही रहते थे, रात में भी बहुत कंम आराम करते। ज़्यादातर _ जनता की देख-भाल के लिए-गश्त लगाया करते।

एक दिन॑ की बात है, आप गश्त लगाने निकले घूमते फ़िरते ,

,दूर तिकल गए वापसी पर एक झोपड़ी पर नजर पड़ी, देखा कि.

“» एक औरत चूल्हा ज़लाये बैठी है चूल्हे पर हांडी चढ़ी हई है और

उसके बच्चे रो रहे हैं, औरंत उन्हें बहलां रही है, मगर वे किसी

तरह खामोश नहीं होते बच्चों का रोना-बिलखना देख कर हजरत

'उमर (रजि०) का दिल भर आया | आप करीब गए, देर तक देखतेः

रहे मंगर उनकी समझ में नहीं,आया कि बात क्‍या है, आखिर

' औरत के पास जाकर.बच्चों के रोने का सबब पछा,उसने बताया कि 'ये बच्चे भूख के मारे बिलख रहे हैं। *

:.. इन्हें खाना क्यों नहीं देतीं? हंज़रत उमर ने पूछा, इतनी दिर : - से खड़ा देख रहो हूं, तुम्हारी हाँडी चंढ़ी हैं, आखिर यहे.कब तैयार *

हे होगी?” श्र

“हॉडी-में कछ है नहीं ।” औरत ने,जवाब दिया, (बच्चों को 0 5

बहलाने. के लिए सिर्फ़ पानी चढ़ा दिया है। चाहती हूँ कि किसी - प्रकोर इन्हें नींद जाय” और यह सो जाँय। न्‍ हज़रत उमर (रजि०) ने देखा तो सचमुच हांडी में सिर्फ़ पानी और क॒छ कंकरियां थीं॥ इसका सबब यह था कि खाने को कछ नहीं » था, बच्चों का भूख से बुरा हाल था उनकी तसंलली के लिए औरत - : ने चूल्हा जलाकर हाँडी में पानी .और कंकरियाँ-डाल दीः थीं, ताकि -

बच्चे समझें किःखाना'पक रहा है। .क॒छ देर में.नींद जायेगी.। -:

* और यह सो रहेंगे, फिर किसी किसी तरह रात कट जाएगी | औरत बेचारी बेवा थी, बच्चे यतीम और अनाथ थे। घर में कमाने. -

._ ब्राला-कोई था, बैतुलमान (सरकारी खजाने) से भी अभी तक कोई

. वजीफा मुक॒र्रर नहीं हुआ था दर्द और ग़म की यह कहानी सुंनकंर - हजरत उमर.-(रज़ि०) की आंखों में आंसूं जारी हो गये ऐसा मालूम. होता-था कि-आप पर ग़म का एक पहाड़ ट्ट पड़ा आपने दर्द के सार्थ कहा *

« » माई तुमने खलीफ़ा को खबर क्यों “न दी?” - : औरंत :- "मेरे और-उमर के बीच अल्लाह फ़ैसला करेगा, मैं. औरत ज़ात किससे कहती फिरूं। उसका फर्ज है कि वह अपनी जनता की: ख़बर रखे अगर वह अपंनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर

» सकता तो व्रह ख़लीफ़ा क्‍यों हो गया?”

हंजरत उमर (रजि०) पर मानो बिजली गिर गयी। यह:

|

सुनकर वह तुरन्त-भागे हुए बैतुलमाल पहुंचें।आटा, गोश्त, घी और -

खंजूरें लीं, पीठ.पर लादकर चलने लगे,तो उनके गुलाम ने कहा :- . : *- -* "ऐँ मुसलमानों के अमीर आप क्यों जहमत कर रहे हैं, लाइये

:. : मैं पहुंचा दूं।

“, हजरत उमर (रजिं०) ने कहा, ''नहीं! जब किंयामत में तुम है 52 एक हा डा

.- मेरा बोझ नहीं: उठा सकते, तों आज मैं तुमसे क्योंउठवाऊँ | यह : . “कहकर- आप सारा सामान खुंद- लाद कर.उसे औरत के पास पहुंचे, * . 'खद'ः बैठकर - आग फंकी, खाना तैयार करके बच्चों को पेट भर « “खिलाया, बंच्चे -हंसी-खुशी सो. गए.।. , चलते समय औरत ते कहा.:--. ४: * "खलीफा बनने कें/लायक़ तो. तुम हो, कि 'उमर

हजरत उमर बोले, “माई! माफ़ करना, उमर मैं ही हूं, मुझसे. * सचम॒च ग़ल॒ती 'हुई कि अब तक तुम्हारी ख़बरं ली।

.: * . इसके बांद हजरत उमर (रजजि०) ने बैतुलंमाल से औरत और " “बच्चों,का वजीफा मुक्र्रर-करां दिया।._.'

* १; हज़रतं उमर (राजि०) का क्‍्यां उसूल था? : “२.. औरत से क्‍या बातंचीत हुई? - 9 “३. बच्चों को बहलाने के लिए औरत नें क्या किया थो?,. .. ४. हजरत उमरं,(रज़ि०) ने किस तरह मदद की? , 7. “/ ५: चलते समय औरत: ने क्या कहा?” .' कर

ड़ + हि

८.

न्दः बेटे के लिए करबानी

हिन्दुस्तान में मुगल बादशाहों ने बहुत दिनों तक हुकूमत की. मगल हकमत को सबसे पहले क़ायम करने वाला बाबर बादशाह था। बह अपने लंड़के- हमायँ से बड़ी मोहब्बत करता था।

एक बार.की बात है हमायूँ सख्त बीमार पड़ा,उस समय वह संभल में था। बाबर ने उसे आगरा बुला भेजा . रास्ते में बड़ी . देख-भाल की. गयी, फ़िर भी आगरा पहुँचते-पहुँचते हुमायूँ को “सरसाम हो गया और हालत इतनी बिगड़ गयी कि हकीमों और

- वैद्यों ने जवाब दे.दिया। अब तो बाबर को बड़ी फ़िक्र हो गयी |:

282 >दिन हालत -खरोॉबं होती गई बाबर अपने बेटे के लिए.

बहुत फिक्तमन्द रहने लगां। उसकी परेशानी देखकर बूद हमायूँ की. माँ दुःखदर्द . भूल गयी। और बादशाह. को - समझाने-बुझाने लगी कि आर्प इतना क्यों घबरांते हैं? आपके और

कई लंड़के हैं.। आप ख़ुद बादशाह हैं बादशाहों को किस बाते का ' दःख हो. सकता: है?

बाबर ने जवाब दिया, तुम्हारा कहना ठीक॑ है। मैं बादशाह...

जरूर हूँ,मगर सांथ ही साथ बाप भी तो हूँ.। अपने प्यारे बेटे की . संख्त बीमारी कैसे सहन करूँ?”

:. “जब हंमायूँ कीं हालत बहुत-खूराब हो गई और ज़ीने की , . ' “उम्मीद रही तो बाबर ने अपंने|दरबारियों को: बुलाकर पूछा. :-

3.१९

' "अब हुमायूँ के लिए. क्‍या किया जाय?” लोगों ने * अलंग-अलग राय दी .एक ने कहा,. आप अपनी सबसे प्यारी - चीज उनके बंदले में क़रबान कर दें। शायद अल्लाह मियाँ कुब॒ल कर लें और यह बच जाय॑ँ। : बाबर के दिल में यह बात-बैठ गई |. उसने पूछा :- “मेरे “खजाने में सबसे कीमती चीज कौन सी है, जिसे मैं करंबान कर दं? . लोगों ने-कहा, "हीरे जवाहरात और रुपये पैसे | आंप इन्हें गरीबों में बांट दें ।”” ब्रादशाह को यह जवाब पसन्द आया उसने सोचा; / मेरी सबसे प्यारी चीज तो मेरी जान है, बेटे के बदले तो मुझे अपनी जान करबान करनी चाहिए। .. यह सोचकर बाबर ने रोजा रखा, इबादत की, फिर संजीदगी , से.हमायूँ. के कमरे. में दाखिल हुआ तीन बांर उसके पलंग का चक्कर लगाया। चक्कर लगाते-समय वह ,गिड़गिड़ा कर दुआ ,

“करता जा रहा थथा कि ''ऐ अल्लाह! मेरे बेटे की जान बंच जाय उसके बदले में मेरी जान ले ले.। अल्लाह: ने उसकी दुंआ सुन ली |

.“ हमायँ-धीरे-धीरे अच्छा होने-लगा;. अब बाबर बीमार पड़ा और

कछ दिनों बाद“उसीः:बीमारी से उसकी मौत हो गयीं।” ,

सवाल * + १. बाबर कौन था? उसने हुमायूँ की बीमारी. में, क्या किया? २. दरबारियों ने क्या सलाह दी? 775

३. बाबर ने बेटे पर-जान कैसे क़रंबान की?

पजण्ण एहतियात

हजुरत अबूबकर (रज़ियल्लाहुअन्ह) बहुत सादा जिंदगी गुजारते . थे|। अपना कामःखद करते, दसरों की भी खिंदमत्‌ करते वे कपड़े" की तिजारत किया करते थे ख़लीफ़ा होने के बाद भी आप ने : कारोबार जारी रखों | कपड़ों की गठरियाँ कन्धों पर लाद.कर - . बाजारों और गलियों में बेचा करते इसी आमंदनी से उनेंका खर्च :

चलता, मगर खलीफ़ा होने की वेजह.से उनकी जिम्मेदारियाँ बहुत

बढ़ें गई थीं। अब कारोबार के लिये समय्‌, नहीं मिलता था, ' ' इसीलिए आपको कारोबार छोड़ना पड़ा और मुसलमानों की सलाह.. * *

'से बहत थोड़ी रकम बैतुलमाल से लेकर काम चलाने लंगे। एक दिंन उनकी बीवी - ने कहा, 'ऐ मुसलमानों के अमीर!

, आज कछ मीठी चीजें खाने को जी चाहता है,.अगर आप मीठा मंगा गाः ४:

देते तो अच्छा होता

आप ने फ्रमाया, 'बैतुलमाल इसके लिए.नहीं है| और मेरे. रा

' पास भी पैसे नहीं हैं, जिससे मीठा मँगा दूँ। यह संनकरं उनकी बीवी चुप हो गई .और बैतुलमाल की.

आमदनी से रोजाना थोड़ा-थोड़ा बचाकर एक दिन मीठा मँगवायां |

' मीठा खाना पका कर हज़रत के पास ले गईं, तो उन्होंने पूछा तुम्हें मीठा कहाँ से मिल गया?” उतकी बीवी ने बताया कि किस तरह कई दिन से बचानबचा ...

_करउन्होंने इसके लिए पैसे जमा किए थे।.

< / »हेजरत-बोले, "तुम बचाती रहीं और घर में किसी को पता भी - /न्‌ लग सका कि हमारें खाने में कुछ कमी गई.है, इसंका मंतलब तो-यह हैं कि हम इतनी रक़॒म.बैतुलमाल से ज्यादा ले रहे थे।”” -

इसके. बाद आपने अपने वज़ीफे में से इतने -पैसे:कम करो दिये। . के ड़

“सवाल: के हक १. हज़रतः अबू बक्र (रजि6)-के गुज़॒रं बसर कां? क्या इन्तंजाम थां? २. :आप्रकी अपनी बीवी से. क्‍्यां बातचीतः हुई! ! ३. आपने अपने बज़ीफ़ें में कमी क्यों, करां दी ' * *

११

अमन की कोशिश

इस्लाम से पहले अरब करे लोग बड़े लड़ाकू थे बात-बात पर लड़ते और. अगर किसी तरफ़ का कोई आदमी मारा जाता तो जब तकं उसका बदला ले लेते, चैन से बैठते,इस तरह रोज लड़ाइयां होती रहतीं। और जब एक बार लड़ाई की आग भड़क उंठती तो फिर सालों तक बझने में आती और अरब के एक बहुत बड़े.. हिस्से के अमन को. जला कर राख कर देती। इन लड़ाइयों.की वजह से देश में बड़ी बेचैनी रहती, हज़ारों आदमी तबाह हो जाते किसी को भी अपने और अपने ख़ानदान और रिश्तेदारों की जान महफूजे नजर आती इस ख़न ख़राबे का अंजाम यही होता कि सैकड़ों औरतें ब्रेवा और हजांरों बच्चे यतीम हो जाते इन बेवाओं और यतीमों की कोई * खबर लेने वाला होता, जालिम लोग उन्हें सताते और तरह-तरंह से परेशान करते, गलामों.का हाल तो उनसे भी बुरा था। उनके - साथ बिल्कल जानवरों की तरह सलूक किया जांता। प्यारे नबी (सल्‍ल०).अभी कम उंम्र ही थे अल्लाह.ने आपको अभी नबी भी नहीं बनाया था। परन्तु आप शुरू ही से बहुत नेक , थे। इन दःखभरी चीज़ों को देखकर आपं बहुत कूढ़ते | आप इस बात की कोशिश करते कि किसी तरह इस प्रकार का वाकिया ही हो जिससे लडाई झगड़े और देश का अमन जाता रहे इसलिए हजरे :

* २३

असवंद (काला पत्थर) को काबे की दीवार में लगाने के सिलसिले में जब क़्रैश के सरदारों की तलवारें खिच गईं और लगता था कि खन ख़राबा होकर रहेगा, उस समय हज़रत मुहम्मद (सलल० ) ने कितने अच्छे ढंग से झगड़े को ख़त्म कर दिया था। आपने (सलल० ) एक चादर में हजरे असबद को रखवाया, फिर एक-एक किनारा सारे सरदारों को पकड़वायां और ले जाकर दीवार में लगवा दिया और . इस प्रकारं अरब वासियों को एक बड़ी तबाही से बचा लिया। '

इसी बीच इत्तेफ़ाक से एक विदेशी ताजिर तिजारंत का सामान लेकर मक्का आया।यहाँ लोगों ने उसका सामान लेकर अपने घरों में रख लिया और कीमत' नहीं दी। वह बेचारा रोता-पीटता कई आदमियों के पास गया, परन्तु किसी ने उसकी मदद नहीं की ! एक विदेशी ताजिर को इस हाल में देख कर आप (सल्ल० ) को बहुत दुःख हुआ। आप (सल्ल०) अक्सर इस .प्रकार के- जल्मों. की रोकथाम की तदबीर सोचते रहते थे।

अरब के क॒छ नेक दिल लोगों ने पहले से ही एक समझौता कर रखा था, जिसका नाम 'हल्फूल फ़िजूल' था इसके मेम्बर इस बात का अहद' करते थे कि हम सब मिलकर पीड़ित और मजलम लोगों की मदद किया करेंगे, परन्तु धीरे-धीरे लोगों ने इस अहद को भला “दिया था। आपने बहुत से क़बीलों के सरदारों और समझदार लोगों को देश की इस तबाही, लूट-खसोट, बदअमनी, रास्तों की ख़तरनाकी, ग़रीबों, मुहताजों, और मुसाफिरों के साथ ब्रा सलक _ और उसके सुधार की ओर ध्यान दिलाया आख़िर एक कमेटी बन गयी जिसमें बनू हाशिम, बनू अब्दिल मुत्तलिब, बन असद, बने ज़ुहरा और बन्‌ तमीम शामिल थे।

इस कमेटी के मैम्बर यह अहद किया करते थे : १. हम देश से बदअमनी दूर करेंगे,

+ज्र्ड

२. हम मुसाफिरों की हिफ़ाज़त किया करेंगे, ३. हम ग़रीबों और बेसहारा लोगों की मदद किया करेंगे,. ४. हम. ताक़तवर को' कमज़ोरों पर जुल्म/करने से रोकेंगे। . इस तदबीर से देश की बदअमनी एक हद तके दूर हो गयी, लोगों के माल और जान भी बहुत कछ महफूज|हो गये। आप : (सलल०) नबी हो जाने के बाद भी फ़रमाया करते थे-

“मैं आज भी उस समझौते पर अमल करने को तैयार हं।

सवाल : ;

१. हल्फूल फ़िजूल के बारे में तुम क्या जानते हो? .,

२. हजूर (सलल०) फ़साद और फितनों से बचने के लिए क्या तदबीर करते.. थे

| ३. आप (सल्ल०) ने अमन. कायम करने की क्‍या राह निकाली? ४. समझौते की शर्तें क्या थी?

र्श

प्यारे, नबी० (सल्ल०) के| एक साथी का. नाम हज़रत अबतलहा था-।, उनकी -.बीवी/बड़ी नेक थीं.।' “इनका एक: नन्हा-मन्ना बच्चा था.) वह बच्चां बहुत प्यारा था, इत्तिफाक से. .

एक दिन;बच्चा बीमार पूड़ा और कुछ दिन की बीमारी के बांद वहें * गुजर गया।

. - पघ्यारेंबच्चे के इन्तिकाल सें माँ को बहुत दःख हुआ, मगर बह . [भी बड़ी सून्न वाली: औरत, उन्होंने बच्चे की लाश एक़ कपड़े में. .

: लपेट कर एक ओर रंख'दी और घर का-काम-काज करेनेः में लग « गई) . .. .

.. इतने में. बाहर से उनके शौहर गयें। उन्होंने अभी खाना

, * नहीं खाया था, घर में पैरे रखते ही बीवी से बच्चे का हाल मालूम * “किया। बीवीने गोलं-मोल सा जवाब दे दिया;जब वे'खाना खांचुके :

- तो बोलीं:-

''क्यों ज़नांब, एक आदमी अगर कछ दिंनों के लिए किसी को कोई चीजे उृधार : दे और सेमय गुजरने के बाढ़ वह अपनी चीज - वापस माँगे तो. क्या उधार लेने वाले को इंकार करना चाहिए?.

: 'शौहर ने कहा-. 'हर्गिज़ नहीं, जब असल मालिक अपनी चीज . माँगता है तो/भला- इंकार कैसे किया जा सकता है?” रे को और हिंम्मतः हुई। बोलीं :-- वह हँसता',

“३६.

'' खेलता बच्चा जो अल्लाह ने अमानत के रूप में हमारे हवाले किया. . था, वापस ले लिया +: आप सनब्न से काम लें और बच्चे के लिए कंफन'.

* और देफ़न का इंतजाम :करें,

5 * कफन दफन से निबटने के बाद मियाँ-बीवी दोनों अल्लाह के

: 'रसूल .के पास हाजिर हुंएं। और आपको पूरा किस्सा सुनाया। मियाँ-बीवीं के इस संब्र से आप पर बड़ा असरं हुंआ ।, अल्लाह से . « दआ की और कछ दिनों के: बाद हजरंत तलंहों के घर एंक और

बच्चा पैदा हआ। उसका. नाम अब्दल्लाह रखा गया। यहीं... |

:' अब्दल्लाह बड़े होकर बड़े आलिम और बंड़े नेक्‌ बुजुर्ग हुए। .. / जिन्होंने माँ-बाप' दोनों का नामें रोशन किया अल्लाह ने उन्क़ी माँ ' की'संब्र और शुक्र का इतना बड़ा बंदलो दिया। . .

२७ जता हि

१३ पड़ोसी का हक

एक बड़े अल्लाह वालें बुजुर्ग गुंजरे हैं! उनकां नाम था शेखर.

' , अब्दुलं-क्रांदिर (रह०) आप गीलान के रहने वाले थे इसीलिए

' आपको गीलानी भी कहा जाता-है। कुछ लोग आपको 'बड़े पीर . . साहब के नाम से भी याद करते हैं। आप बड़ें अल्लाह वाले थे। . आप पर अल्लाह की रहमत होः। आपंके पड़ोस में एक यहूदी रहता था,'जंब आप. नमाज पढ़ते '. या क़्रान शंरीफ़ पड़ते तो यहूदी शोर मचाता,अक्सर बाजों बजांता, - ताकि शेख क़ी इबादंत में बाधा पड़े आप यहूदी की सारी हरकतें '.. सहन करते, उसे खूद;रोंकते और नं किसी को रोकने देते एक बार यहूदी किसी वजह से गिरफ़्तार हो गया, पुलिसःने _ उंसे जेल में बन्द कर दिया शेख को इसकी ख़बर थी।कई दिन तक बाज़ा और शोर की आवाज़ आई, आपने वजह मालूम की तो पता चला कि यहूदी हवालात में है। . शेख्बं को इसका बड़ा अफुसोस ःहुआ कि! इनका प्रड़ोसी इतनी ' बड़ी मुसीबत में पड़ गग्ा और इन्हें ख़बर तक नः हुई वे फ़ौरन - अदालत में पहंचे और हाकिस से कहा कि अगर मेरे पड़ोसी का जुर्म ऐसा हैं कि जुर्माना देने से माफ हो सकता है तो मैं.उसकी ओर से जुर्माना देने के लिए तैयार हूँ, आप उसे छोड़ दें और अगर अंभी परी . तरह से मुकदमे की छान-बीन ने की गई हो तो उस पर नये सिरेसे ,.

रद

. सोच लिया जाय, हो सकता है कि मेरा पड़ोसी बेक़सर निकले 4 . हाकिम.ने काग़ज़ात मँगवाकर जाँच की,किस्मत से यहदी बेगुनाह- * निकला। मुकदमा खारिज हो ग़या और वह जेल से छट. गया + यहूदी पर उनके इस अच्छे बर्ताव का बहुत असर हुआ। . खिदमत में पहुँचकर- अंपने बुरे बर्तावों की माफी. माँगी. और बोला, मैंने आपको बहुत सताया। हमेशा आपंकी इबादत में «बाँधा-डालता रहा, आपको तो मेरी गिरफ्तारी प्र ख़ुंश होना चाहिए था, परन्तः इस मुसीबत में आपने बदला लेने के बजाय मेरी मदद की. और मुझे. जेल से छुड़ायां। आपके बर्ताव से मझ पर बहत॑ असर पड़ा है खुदा के लिए आंप मुझे माफ़ कर दें मैं अब क़्भी आपकी - ब्रेअदबी कंरूंगा।

. आपने फ़र्माया:- “मैंने तुम्हारे साथ कौन.सा एहसान किया. 'हैं, मुझें तो दुःख हैं कि मैं इससे ज़्यादा तुम्हारी. मंदद कर सका इस्लार्म ने तो पड़ोसी का बहुत बड़ा हक़ बतलाया है।”

यह सुनकरं वह और ज़्यादा मुतास्सिर हुआ, उसने कहा :-

... बेशक इस्लाम सच्ष्चा दीन-है;-मैं:अब मुसलमान- होता हूँ इसके बाद वह कलिमा पढ़कर मुसलमान होःगया।

सवाल :

१. बंड़े पीर. साहब का पूरा नाम क्‍या था? “३...आंपका पड़ोसी कैसा आदमी था? 5

.... वबृढ़ मेहमान की ख़ातिरदारी एक बार भूख से निढाल-एक सहाबी (रज़िं०) हुजूर (सलल०) के पास पहुंचे आप (सलल०) ने इन्हें खाना खिलाना चाहा, मालूम. किया तो पता चला कि पानी के सिवा घर में कछ नहीं है यह कोई. नई बात.न भी, प्यारे नबी (सल्ल०) के यहाँ अक्सर खाने को कुछ होता और भूखां रहना पड़ता था। अब क्या करें, उस वक्‍त कई सहाबी हुजूरं (सल्लं०) के पास बैठे थे। आप (सल्ल०) ने फ॒र्माया, "आज की रात इस मेहमान की दावंत कौन अपने जिम्मे लेता है?” हजरत अबू तलहा (रज़ि०) ने जवाब दिया, ''ऐ अल्लाह के रसूल! मैं इसकी जिम्मेदारी लेता हूँ। .,.

और मेहमान को लेकर आप अपने घर आये घर में मालूम. . करने पर पता चला कि यहाँ भी अल्लाह का नाम है सिर्फ़ बच्चों के

. _- लिए थोड़ा सा ख़ाना रखा था-।

आपने बीवी से कहा, "तुम बच्चों को क्रिसी तरह बहला कर | सला दो और जब मैं मेहमान को. घर में ले आऊँ तो ठीक करने के बहाने चिराग़ बुझा देना; हम लोग भी मेहमान के साथ ल्लैठ जाऐंगें | . खाना मेहमान के सामने रंख देंगे। हम लोग भूखे उठ जाऐंगे। » मेहमान को अंधेरे में दिखाई देगा नहीं, वह समझेगा कि घर वालों ने. भी खा लिया | इस तरह वहः अच्छी तरह खा लेगा और इतने खाने में उसका 'पेट भी भर जाएगा।

है

»>0

और फ़रमाबरदार बीवी ने ऐसा ही“कियो, बहाने से चिराग. हा

बुझा दिया, संब-लोग साथ बैठ गए | मेहमान समझा कि सबंखा रहे .. . हैं उसने इत्मीनान से पेट भर कर खा लिया घर वाले भूखे रह. .

गए।. मगर खुश थे क्रि चलों मेहमान का पेट तो भर गया." और *

हमारे. भूखे रहने की उसे ख़बरं भी नहीं हुई। वरना रना मेहमान को. हु

तकलीफ होती | '... सुबह को जबं अबूं तलहा (रज़ि०) हजूर (सलल०) की. *' खिदमत्‌ में पहँचे तो .आप (सल्ल०) ने फ़रमाया या, त्तलहां! तुम्हारे

- रात के अच्छे सलक से अल्लाह बहुत खुश हुआं और यह आयत ..

उतरी है :-... ; ;

“चे“दसरों को अपने ऊंपर तर्जीह देते हैं चाहे वे फाँका ही.

करें 4 कक | बा २२० मक 2

हर

१५

कितने ईमानदार थे!

. ५. हजरत अली (रंज़ि०) के खिलाफत 'कैबक्त-की बातं है कि

एक बार बैतुलमाल (खज़ाने) में मोतियों का-एक हार आया .उस हारं की खूबर आप की बेटी को हुई.।ईद आनेःही.वाली थी बेटी ने

सोचा - कि. ईद में सारी -औरतें अच्छे-अच्छे- कपड़े-.और कीमती जेबरात पहनेंगी, क़्यों ने मैं भी बैतुलमांल से: मोतियों' का हार मँगवाकर पहन लूँ, ईद के बाद वोपस कर दूंगीं। यह सोच कर , बैतुलमाल के मुहाफिज से:कहलवा भेजा कि मोतियों का हार मुझे उधर दे दो ॥.'मैं ईद बाद लौटा दूंगी।

तीन दिन के वायदे पर मुहाफिज ने हार भेज दिया ईद के

* दिन बेटी ने हार पहना इत्तिफ़ाक॑-से.हज़रत अली (रंजि०) की

नजर आप पर पड़ गई आपने पहचान लिया और फ़र्माया “मैं इस

. . लड़की का हाथ॑ कांटंगा, इसने बैतुलमाल से चोरी की है।”'

बेटी ने सफाई पेश की और कंहा गा यह हार महाफिज की इजाजत से तीन-दिन के लिए मगनीं मगाया है, कल इसे लौटा दूंगी

यह सनकंर आप ने महाफ़िज़ को बुलाया और-कहा ''क्या तुम.. महाफिज हो कर मसलमानों .की अमानंत में खियानत करते हो ।'!

/। महाफिज :- भला मैं मुसलमानों के मांल में खियानत कर

. “संकता हूं; मैंने कभी ऐसा' नहीं किया | .,

हजरत अली (रज़ि०) :- “तुम ने मोतियों का:हार मेरी - रेरे

* लड़की को क्‍यों दे दियां?” महाफिंज :- ''बेटी ने तीन दिन के वायदे पर मंगवाया था' इस लिए दे दिया, वरना कभी नहीं देता।” ह॒ हज़रत अली (रज़ि०)- “तो क्‍या यह खियानत नहीं है? - तुमने मुसलमानों की इजाजत के बिना ऐसा क्यों किया हारं फौरन बैतलमाल में जमा करो। मैं अपनी बेटी की इस हरकत पर सख्त नाराज हं.। अगर मंगनी के रूप में और तुम्हारी इजाजत से लिया होता तो चोरी की सज़ा में उसका हाथ काटता ।/' इसके बाद बह हार मंगवा कर बैत॒लमाल में: पहुंचा दिया गया

सवाल

१. बेटी ने हार कैसे हासिल किया था? हज़रत अली (रजि०) को कैसे पता चला? ;

२. आप (रज़ि०) की: मुहाफिज़ से क्या बात-चीत हुई?

३. आप अपनी लड़की की इस हरकत पर क्‍यों नाराज़ हुए?

३३

६... - बहादुरी

.. सुलतानः सलाह॒द्दीनः मुसलमानों का एक बहुत मशंहूर “बादशाह हुआ है वह बचपन ही-से बड़ा.बहादुर था। एक बार. की बात है कि शहर रिहा की ईसाई फौज़ों ने उस शहरं प्रर हमला कर के सारा शहर तंबाह कर दिया माल और/सामान लूट लिया. औरतों को पकड़ .ले गये

सलाहूद्दीन अभी/लड़कां था, मंगर ईसाइयों के जुल्म उससे, सहन हुए | एक बढ़े तर्कीककों साथ लिया और बादशाह के पास दुहाई लेकर गया इमामुद्दीन जंगी वहाँ का बादशाह था, उसकी राजधानी . शहर मूसल थी।. सुलतान जंग्री भी बड़ा बहादुर बाहशाह था। - . यह दोनों मूसल के निकट पहुंचे इत्तिफाक़ से सुलतान जंगी : घोड़े पर सवार कहीं जा रहा था। ये दोनों चीख-चीख॑ कर रो रहे « थे। सुलतान ने घोड़ा रोक कर रोने की वजह पूछी उन्होंने सारा' हाल कह स॒नाया। सुलतान ने पूछा :-

इतना बड़ा जुल्म हुआ औरं तुमने कुछ, किया।

हालांकि संलाहुद्दीन अभी लड़के ही.था, मगर था बड़ा निडर, * झट सामने आंया और बोला “हम क्यो करते; हमरा सुलतान बड़ा बे-खुंबर है हमारे ऊपर जुल्म होते हैं और वह गहंरी नींद में है हमारें लिए कुछ नहीं करता:हम उस के पास दुहाई ले कर जा' रहे

3.॥

हे हुए

हैं का

यह सुनकर| सुलतान घोड़े से उतर पड़ा, बोला; “मैं ही वह - बंदकिस्मत जन्गी!हूं, जिसकी जनता पर जुल्म हो रहे हैं 'और वह बे-खबर है।

यह सुनकर संलाहहदीन नें मांफ़ी माँगी, औरं तफ़सील से सारी बांतें बताईं। बादशाह उन्हें किले में ले गया | -आराम से रखा: अपने सारे सिपाहियों को जमा करके रिहा की दुर्दशा सुनायी सब. को शर्म दिलाई और आख़िर में कहा “कल सुबह मेरी तलवार रिंहा * के किले पर चमकेगी, तम में से कौन-कौन मेरा साथ देगा?” _- सारे फ़ौजी हैरान थे कि रिहा |मूसल से नव्वे मील की दूरी पर है। रातों रात इतनी दूरी तै करना और वहाँ पहुंच 'कर हमला करना यह कैसे मुमकिन: है? बादशाह को क्‍या हो गया है? भला यह मुमकिन भी है? अभी सब लौंग इमकान पर विचार कर ही रहे-थे . कि सलाहुद्दीन बोल उठा-

"हम, कल बादशाह, के सांथ होंगे

सब घबरा कर सलाहद्ीत की ओर देखने लगे। कंछ ने मजाक उड़ाते हुए कहा "बेटे! जाओ खेलो-कूदो, यह जंग है, बच्चों

नहीं हैं।

सलंतान जंगी ने यह बातें सुनीं, गुस्से से चेहरा लाल हो गंया गरज॑ कर बोला "यह बच्चा सच कहता है इसकी सूरत बताती है. कि यह ,मेरा-साथ द्वेगा:।

. अब तो फौज़ियों को बड़ी शर्म आयी सब तैयार हो गये | दूसरे दिन दोपहर तक रिहा के फाटक पर पहुंच गये इत्तिफ़ाक़ से रिहा का ईसाई-बादशाह आराम करने के लिए दूर के गांव में चला गया था.। अब तो बड़ा अच्छा मौका मिल गया सुलतान जंगी ने

इ्ध्ू

धावा बोल दिया ५. बड़े, घमासान की लड़ाई हुई | ईसाई सेना का .. सरदार बड़ी -आन-बान-से सामने आया, सुलतान जंगी ने तेज वार. .. » - किया, परन्तु उसकी ज़िरंह लीहेकी थी कर तो कट गयी परन्तु

_ वह घायल हुआ उसने सुलतान पर.बड़े जोर से हाथ मारा, . “भाला पड़ने ही वाला था कि सलाहद्दीन बिजली की तरह बीच में : -

गंया-और जिरह*के कटे हये हिस्से पर इतने ज़ोर.से वार किया कि _ संरदार के दो २०३ गये | सरदार का मारा जाना था कि

फौज, भांग खड़ी हुई रिहा: पंर मुंसलमानों का कंब्ज़ा हो गया _मंसंलमान औरतें वापस मिंलीं। हे

' /* सलाहुद्दीन, की बहादुरी देख कर सब वाह-वाह करने लगे। #

- खाल: ..

“१. सलाहुहीन कौन थो? यहं सुलतान .जुंगी:के पास कैसे आया? ,

२.४उसकी शिकायत परं सुलतान जंगी ने क्या किया? फौंज चढ़ाई के लिये| किस तरह तैयार हुई! ..

३..ईसाई सेना. का सरदार किस तरह मारा गया? उसके कत्ल का ईसाई"! सेना पर क्या असर पड़ा?

४. रिहा कैसे जीता गया? जीत के बाद: क्या हुआ?

>१७ तड़क-भंडक कपडों से बंचों

हजरते उमर (रजि०) के जहर यम सांदा होते थे आप क॒हा करते थे कि मझे तीन चीजें बहत हैं, १. नेक बातों की| नसीहत. करना, /२ बुरी बातीं से रोकना,,६. पेराने कूपड़े इस्तेमाल!

करना।. . * आप अक्सर फंटे-पुराने कपड़ों में रहते, कभी-कभी तो करते ,

धमें अनेकों पेवन्द लगे होते, एक दिन आप॑ मिम्बर पर खड़े हये शत दे रहे थे कपड़ों में बीसियों पेबन्द लगे थे, (४०874

का भी था। यह उस समय की बात है, जब दुनिया के : * बड़े राज्य ईरान और रूम को जीता जा चुका था और इस्लामी राज्य ' ' दुनिया के एक बड़े भाग तक॑ फैल चुका/थां | सरकारी खज़ाना - भरप्रथा। मुसलमानों के असीरःका फटा पुराना! कपड़ा देख

कुछ मुसलमानों के दिंल- में ख्याल आया कि अंब हंज॑रत उमर +

(रज़ि०) को अपने कपड़े बदल देना,चाहिए ,और |कम से कम. फटे-पुराने: कपड़ों से तो परहेज.करना चाहिएं। पं

5 - इसलिए एक वफ्द बेनों कर'ख़िदमत में पंहुचे, परन्तु के...

: हज़रत के मिजाज को खूब जानते थे, किसी की हिम्मत 2५८ ॥/- अन्त में आपकी बेटी हजरत हफ्सा (रजि०) को तैयार किया कि दबाव डांल कर हज़रत को फटे-पुराने कपड़े पहनेने से रोकें हजरत हफ्सा (रजि०) हजूर (संलल०) की पाक बीविय़ों में से थीं, _ इंसलिए. बेटी होते हुए भी हज़रत उमर (रजि०) उनका ख्याल रईखत्ते

३७

है

थे। हज़रत हफ्सा (राज़ि०) साहस करके आप के पास- गईं और बहत जिंद की। हर प्रकार से दबाव,डाला। लेकिन .आप ने फर्माया:*

“बेटी तुम तो रसूल (सल्ल०5) के साथ रह चुकी हो, तुम्हारे 'घर में 'उनके लिए क्‍या इन्तिज़ाम था? * हज़रत हफ्सा (राजि०) ने जवाब दिया, ''मेरे कमरे में तो आप सलल० के सोने के लिए एक टाट था, जो दो तह कर के जमीन पर बिछा दिया जाता था, उसी पर आप (सल्ल०) लेटे रहते थे अक्सर पाक़ जिस्म पर निशान पड़ जाते थे एक दिन मैंने टाट को चार तह. 'करके बिछा दिया तो हुजूर (सल्ल6। बे फर्मायाँ कि 'हफ्सा! आज 'मने क्‍यां बिछा दिंया, मुझे बहुत गहरी नींद आई” मैंने बताया तों आप (सल्ल०) ने)फ़र्माया कि "इसे पहेले ही की तरह बिछाया करो यह सनकर हजरत उमर (रजि०) ने फ़रमाया “क्यों हंफ्सा! जिस के रसूल ने इतनीं तंगी, और सादगी के साथ जिन्दगी गुजोंसि, उस के मानने वालों को यह कब अच्छा है कि वह ठाट-बाट के साथ, रहें और तड़क-भड़क वाले सुन्दर कपड़े पहनें | तुम मुझ पर क्‍यों दबाव डालती हो?

हजरत हफ़्सा आपकी बात सुनकर चुप्र हो गईं और फिर कभी. ' जिद नहीं की

सवाल :

१. हजरत उमर (राज़०) कौन थे? उनकी प्यारी चीजें क्‍या थीं? २. आप कैसे कपड़े पहनते थे? * ३. हज़रत हफ्सा आप से किस बात पर॑ जिद कर रही थीं? ४. आपने हजरत हफ़्सा (रजि०) को किस तरह समझाया? ५. इस कहानी से तुम्हें क्या सबक़ मिलता है?

है] रे

>

' इंच

वृष

लोगों, की भलाई के काम

हारून रशीद-का नाम॑ तो सुन चुके हो, अब्बासी खानदान में

वह बह॒त बड़ा बादशाह हुआ है। उसकी रानी का नाम जुबैदा -ख़ातून था | यंह बहुत नेक औरत श्री | लोगों की भलाई के कामों

उन्हें , बहुत लगाव था/। अरब-के चटियल रेगिस्तान में पानी * कमी को महसूस करके उन्हें बड़ी तकलीफ होंती थी खासतौर पर «» मक्का और उसके आसपास के लोगों की इसे परेशानी को वह द्र' . करना चांहती थीं। अपने राज्यं-के बड़े-बड़े! इंजीनियरों को बुलायां और उनसे कहा:- "कोई ऐसी तरकीब बताओ कि मकके तक पानी . पहुँच ज़ाये ताकि वहां के लोगों की तकलीफ दूर हो जाये” महारानी के हक्‍म की देर थी, इंजीनियर तुरन्त.मौके. पंर पहंच गये घूंम-फिरं कर अच्छी तरह जायजा लियां। आस-पास का नक्शा तैयार करके रानी के सामने. पेश किया. और बताया कि तायफ के

निक़ट- पहाड़ से एक सोता बह कर हनैन की ओर आता है, इस झरने

से नहर निकाल कर मकक्‍के तक पहुंचायीः जा सकती है, परन्तु रास्ते

में बहत से पहाड़ हैं इन्हें काट कर नहर का रास्ता बनाना आसान .

नहीं है, इस पर बहुत मेहनत और बड़ा धन ख़र्च होगा।

तुम खर्च की परवाह'न करो ।” महारानी ने कहा, “अगर ' एंक क॒दाल मारने की मंजदूरी एक अशरफी भी होगी तो मैं खुशी के

साथ अदा 'िलना' कै . [हुक्म था कि इंज़ीनियर अपने काम प्र लग गये | ड्र्९

काम शुरू हो गया-। तायफ से मक्के तक नहर के रास्ते के लिये जमीन खरीद ली गई | क्रीब के सभी झरनों, सोतों और चश्मों को मिला कर एक बंड़ा सोता तैयार कर लियां गया, फिर इससे नहर 'निकाल कर मक्‍के तक पहुंचाई गयी। . तीन॑ंसांल की लगातार मेहनत और बड़ी दौलतं ख़र्च करने के बाद यह नहर तैयार हो गई | महारानी की ख़्वाहिशं पूरी हुई , मकक्‍के तक नहर पहुंच गई, महारानी की यहं यादगार नहरे जुबैदा के. * नाम,से अब तंक मशहूर है। महारानी ने चाहें'जंमज॒म (जुमज॑म नामी कूंवा) को भी' साफ * कराया था, इस में भी काफी पानी।निंकंल आया था, जिससे मक्के वालों को। बहुत आराम पहंचा।