शता) श्रीरामार्चनपद्धति: ॥७-॥ हनी श्रीसीतारामाभ्यां नम: म्रौशमानन्दा चे th श्रीहनुमते नमः मळ, & 4 4८ प्रस्थात्रयानन्दभाष्यकाराय नमोनमः जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यप्रणीत

श्रीवैष्णवम॑ताब्जभास्करपरिशिष्ट श्रीरामार्चनपद्धतिः

तदित्थं मुमुक्षुरुपासको मुहूर्तमात्राविशिष्टायां रात्रौ प्रतिबुध्यनिरालसप्रात | समुत्थाय धौतपाणिपाद: प्राङ्मुखः स्थित्वा- | हरिः ३% सचन्तयदुषसः सूर्येण चित्रामस्य केतवो राम विन्दन्‌ आयन्नक्षत्रं ददृशे दिवो पुनर्यतो किरद्धानुवदे हरिः अर्वाचीसुभगे ? भव सीते ? वन्दामहे त्वा यथा नः सुभगाऽससि यथा नः सुफलाऽससि इत्यादिकमनुसन्धाय बहिनिर्गत्य दक्षिणकर्णे यज्ञसूत्रं संवेष्ट्य उत्तराभि मुखो भूत्वा मूत्रपुरीषोत्सर्जनं कुर्यात्‌ ततोऽतन्द्रितो गन्धलोपकरं शौचं विधाय | सप्तकृत्व: सजलामलकमात्रमृत्तिकाभिर्गुदप्रक्षालनं कुर्यात्‌ त्रिः सकल मृत्तिकाभिलिड्रशौच॑ ततो दक्षिणवामहस्तौ प्रत्येकं दशकृत्व सजलमृत्ति काभिः प्रक्षाल्य दक्षिणवामपादौ पञ्चकृत्वस्ताभिः प्रक्षाल्य षोडश कृत्वा गण्डूषमाचरेत्‌ ततो द्विराचम्य शरीरशुद्धये स्नानं प्रोक्षणादिकं वा यथा शक्ति विधाय गुरु परम्परानुसन्धानपूर्वकतत्तन्मन्त्रानुच्चायों दर्ध्वपुण्ड्रान्धृत्वा पुनः स्वाचार्य ध्यात्वा गुरुपरम्परानुसन्धानपूर्वकं रहस्यत्रयं चानुसन्धाय पश्चात्‌ . सन्ध्यावन्दनादिकर्म तत्प्रयोगविधिना भगवदाज्ञया भगवत्कैड्डूर्यत्वेन कुर्यात्‌ | आनन्दभाष्यसिंहासनासीन

जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यश्रीरामेश्वरानन्दाचार्यं प्रणीता गङ्गा पा |

समारम्भां रामानन्दाचार्य मध्यमाम्‌

रामप्रपन्नगुर्वन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम्‌

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१४८ गङ्गासहितः

अनादिकाल से संसार सागर में स्वकर्म जालाभिभूत होकर संसरणशील जीवों के उद्धार हतु जगदगुरु श्रीसुरसुरानन्दाचार्यजी ने जगदुद्धार हेतु अवतरित ' रामानन्द: स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले'' इस आगम शास्त्र बोधित करुणाशील जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी महाराज से “तत्वं किम्‌’? १/४ आदि दश प्रश्न किये थे उन प्रश्नों में पाँचवाँ प्रश्न '“'धर्मएकोऽस्ति कश्च” १/४ श्रीवेष्णवमताव्जभास्कर के इस पाँच वें प्रश्न के जवाव में आनन्दभाष्यकार महाप्रभुजी ने सर्वधर्म मुख्यात्मक श्रीवैष्णवधर्म निरूपण प्रशङ्ग में अर्चावतार की चर्चा “'अर्चावतारोऽपि च'' ५।११ तथा स्वयं

'“व्यक्तश्च'' ५१२ इन श्लोकों से कर-

“' आवाहनासनाभ्यां पाद्याद्याचमनैस्तथा स्नानवस्त्रोपवीतैश्च गन्धपुष्पसुधूपकैः ॥५।१३॥ दीपनैवेद्यताम्बूल प्रदक्षिणवसिर्जनैः षोडशार्चाप्रकारैस्तमेतैरर्चेत्सदासुधीः ॥५।९४॥

का उपदेश किया अर्थात्‌ मुमुक्षु भजनानन्दी महापुरुष प्रातः उठकर के शौचादि स्नानान्त प्रात्यहिक कर्म करलेने के वाद संमाजित पूजास्थानादि में उपस्थित होकर आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञसूत्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य-ताम्बूल, प्रदक्षिणा और विसर्जनान्त षोडशोपचार विधि से समन्त्रक सर्वेश्वर श्रीरामजी की सर्वदा पूजा करें पूजक यदि द्विज हों तो पुरुषसूक्त विधान से पूजन करें द्विजेतर हों तो पौराणिक विधि से नियत रूपसे अर्चना करें इसप्रकार अतिसंक्षिप्त रूपसे श्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा का उपदेश महाप्रभुजी ने किया पर इस सूत्रात्मक उपदेश से सामान्य जन जिस प्रकार से सर्वेश्वरजी की सेवा होनी चाहिये उस प्रकार नहीं कर पायेंगे, ऐसा विचार कर कारुणिक आचार्य श्रीने श्रीमुख से ही ' श्रीरामार्चनपद्धति' का उपदेश किया जो कुछ विस्तृत तथा गद्यपद्य मय होने से स्वमुखारविन्द से ही उपदिष्ट श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर के लेख-परिशिष्ट भी है पर यह है एक ग्रन्थ का पि pose कमान ष्ट भाग ही महाभारत का शेष भाग

हरिवंश के समान अतः आचार्य प्रवर-' 'तदित्थम्‌ - तदित्थ प्रसङ्गानुसन्धान पूर्वक उपदेश प्रारम्भ कर रहे | ग्‌ इत्यादि से पूर्वोपदिष्ट

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|

९४९

RR स्स्स ज्ज्जिज वि जिया भवसागर से मुक्ति की इच्छा वाले साधक को चाहिये कि दो घडी रात्रि शेष इहते ही प्रातःकाल में सर्वदा आलस्य रहित होकर उठ जायें अनन्तर हाथ पैर धोकर यथेच्छ कुल्लाकर पूर्व दिशा के तरफ मुखकर बैठ जाय तब अत्यन्त तन्मयता से “हरि; ३४ सचन्तः '' तथा ''अर्वाची'' इन मन्त्रों का तथा प्रातः स्मरण के पाँच श्लोकों या पन्द्रह श्लोकों का मधुर स्वर से अर्थानुसन्धान पूर्वक प्रार्थना करें अनन्तर बाहर दूर जाकर दाहीने कान में यज्ञसूत्र को वेष्टित- चढाकर उत्तराभिमुख होकर मलमूत्र का त्याग करें। पुनः शौच तथा दुर्गन्ध निवारणार्थ आलस्य रहित होकर आँवले के दाने के बराबर विशुद्ध मिट्टी तथा शुद्ध जल से प्रत्येक वार सात वार गुदा को तीन वार लिङ्ग को विधिवत्‌ प्रक्षालन कर फिर पूर्व कर्म से ही दश वार दोनों हाथ तथा पाँच वार दोनों पैर का प्रक्षालन करें अनन्तर शुद्ध जल से स्नान करे देशकाल स्वास्थ्यादि के आनुकूल्य से प्रोक्षणादि को सम्पन्न करे इसके वाद श्रीरामं जनकात्मजामनिलजं वेधो वशिष्ठावृषी योगीशं पराशरं श्रुतिविदं व्यासं जिताक्षं शुकम्‌ श्रीमन्तं पुरुषोत्तमं गुणनिधि गङ्गाधराद्यान्यतिन्‌ श्रीमद्राघ वदेशिञ्च वरदं स्वाचार्यवर्यं श्रये इत्यादि समस्त पूर्वाचार्यो को अपने आचार्य- अपने दीक्षा गुरु तक सभी का अनुसन्धान सादर स्मरण कर उन-उन मन्त्रों के

उच्चारण पूर्वक बारह ऊर्ध्वपुण्ड्रों का धारण करके अपने आचार्य दीक्षा गुरु तथा आचार्य परम्परा के-

सीतारामसमारम्भां रामानन्दाचार्यमध्यमाम्‌ अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम्‌

इस श्लोक के स्मरण पूर्वक रहस्यत्रय-मन्त्रराज षडक्षर चरममन्त्र तथा शरणागति मन्त्रों का अर्थ के साथ स्मरण कर अनन्तर भगवान्‌ की आज्ञा से सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी का कैङ्कर्य बुद्ध्या सन्ध्या वन्दनादि नित्य कर्मा को शास्त्रीय विधान के अनुसार सम्पादन करे

ततो दिव्यमङ्गलविग्रहस्य साङ्गसायुधसपरिवारस्य श्रीसीतासमेतस्य भगवतो रामभद्रस्य मनसैव एकैकमङ्गं ब्रहासृष्टिलोकोत्तरसौन्दर्यलावण्याढ्यं ध्यायन्‌ दिव्यैः षोडशोपचारैरर्चनं विदध्यात्‌

इसके वाद प्रत्येक अंग प्रत्येक आयुध-सस्रादि परिवार सर्वेश्वरी श्रीसीताजी से सम्पृक्त दिव्य मङ्गल श्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के सर्व लोकोत्तर सौन्दर्य

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९५० गङ्भासहितः

लावण्य से युक्त पृथक्‌-पृथक्‌ अंग का मन से ही सम्यक्‌ ध्यान करते हुये दिव्य षोडशोपचार से मानसिक अर्चना करे

मध्याह्निकानुष्ठानसमयेऽपि भगवच्चरणारविन्दं स्वाचार्यचरणारविन्दं ध्यायन्‌ स्नात्वा भगवद्विभूतिर्भगवच्छरीरभूतान्‌ देवर्षिपितृन्‌ ध्यात्वा संतर्प्य धौतवस्त्रादिकं परिधायाचम्य पूर्ववदेवोर्ध्वपुण्ड्रादिकं विधायैवमेव भगवदाराध नत्वेनैव मध्याह्निकानुष्ठानमपि कुर्यात्‌

भगवान्‌ के मध्याहिक आराधना के समय में भी सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी के चरणकमल तथा स्वाचार्य देवजी के चरणकमलों का ध्यान करते हुये स्नान क्रिया सम्पादन करके सर्वाधार श्रीरामजी की विभूति तथा शरीर भूत देवताओं और पितरों का ध्यान पूर्वक तर्पण करे वाद में स्वच्छ वस्त्र धारणकर आचमन करके पहले बताये गये विधि के अनुसार ही ऊर्ध्वण्ण्ड़ धारण करे इसप्रकार से सर्वदा सर्वेश्वर श्रीरामजी की आराधना बुद्ध्या मध्याहिक क्रिया का सम्पादन करें अधैवमर्चनयोग्यो मुमुक्षुरुपासको भगवन्मन्दिरं प्रविश्य श्रीरामं जनकात्मजामनिलजं वेधोवशिष्ठावृषी

योगीशञ्जपराशरं श्रुतिविदं व्यासं जिताक्षं शुकम्‌ श्रीमन्तं पुरुषोत्तमं गुणनिर्धि गङ्गाधराद्यान्‌ यतीन्‌ श्रीमद्राघवदेशिकञ्च वरदं स्वाचार्यवर्यश्रये

इत्यादिश्रीगुरु परम्परादिकमनुसन्दधत्साष्टाङ्गत्वेन दण्डवद्भगवन्तं प्रणम्य, अर्चनपात्रादीनि संमृज्य शुद्धजलेन संप्रक्षाल्य समर्चनीयदेवस्य दक्षिणपाएंवें समुपविश्य पूर्वदिनसमपितगन्धमाल्यतुलसीदलादिमपनीयपीठोपरिसन्निवेश्य आग्नेयादारभ्य प्रदक्षिणऋ्रमेण, अर्ध्यपाद्याचमनस्नानपात्राणि संस्थाप्य तेषां मध्ये शुद्धजलपात्रं निधाय

पूर्व में प्रदर्शित क्रिया के द्वारा सर्वेश श्रीरामजी की अर्चना के योग्य हुए सायुज्य मोक्ष की इच्छावाले उपासक को भगवान्‌ के मन्दिर में प्रवेशकर श्रीरामजी श्रीजानकोजी श्रीहनुमानजी श्रीब्रह्माजी, श्रीवशिष्ठाऋषिजी योगियों में श्रेष्ठ श्रीपराशरजी वेदज्ञाता श्रीव्यासजी जितेन्द्रिय श्रीशुकदेवजी सर्वगुणों के खजाने ऐश्वर्यशाली शरीपुरषोत्तमाचार्यजी बोधायन यतियों में श्रेष्ठ गङ्गाधराचार्यजी आदि समस्त पूर्वाचायोँ के साथ अपने गुरुदेव वरदाता श्रीमान्‌ जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी का मैं

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ति ७.4 रेप गीरामार्चनपद्धति: १५१ क्क

आनप प्रकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य आश्रय लेता हूँ अर्थात्‌ समस्त पूर्वाचार्यौ को सादर दण्डवत्‌ प्रणाम करता हूँ

श्लोक के आदि शब्द से श्रीसदानन्दाचार्यजी श्रीरामेश्वरानन्दाचार्यजी श्रीद्वारान न्दाचार्यजी, श्रीदेवानन्दाचार्यजी, श्रीश्यामानन्दाचार्यजी, श्रीश्रुतानन्दाचार्यजी, श्रीचिदानन्दाचार्यजी, श्रीपूर्णानन्दाचार्यजी, श्रीश्रियानन्दाचार्यजी तथा श्रीहयानन्दाचार्यजी का ग्रहण होता है क्योंकि श्रीआचार्यजी के परम्परा में श्रीरामजी से लेकर उनके गुरुदेव जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी तक २१ आचार्य हैं अतः आचार्य प्रवर आनन्दभाष्यकार श्रीरामानन्दाचार्यजी श्रीसम्प्रदाय (श्रीरामानन्दसम्प्रदाय) के २२ वें आचार्य हैं इत्यादि श्रीगुरु परम्परदिक का अनुसन्धान करते हुये समाराधनीय भगवान्‌ को सादर साष्टाङ्ग दण्डवत्‌ प्रणाम करके पूजा के पात्रों को मलकर शुद्ध जल से धोकर स्वच्छ करे, अनन्तर समाराधनीय देव के दाहिने भाग में बैठकर पहले दिन के चढे पुष्प चन्दन गन्ध तुलसीदल माला आदि को वहां से हटाकर पीठ वा डाली में रखकर एक तरफ कर दें अनन्तर अग्निकोण से प्रारम्भ करके प्रदक्षिणा क्रमसे अर्घ्य पात्र पाद्य पात्र, आचमनीय पात्र स्नानीय पात्रों का स्थापनकर उनके मध्य में शुद्ध जल पात्र का स्थापन कर-

तत्रर्घ्यपात्रे सिद्धार्थाक्षतकुशाग्रतिलयवगन्धफलपुष्पसहितंजलं निक्षिपेत्‌ ( ) दूर्वाविष्णुपणीपद्यशयामाकसहितं जलं पाद्यपात्रे निक्षिपेत्‌ ( २) एलालवि ङ्गकङट्कोलजातिसहितं जलमाचनपात्रे निक्षिपेत्‌ (३) कोष्टमाजिष्ठहरिद्रामुस्ताशै लेयचम्पकवचकर्पूलामज्जकसहितं जलं स्नानपात्रे निक्षिपेत्‌ ॥४॥

अनन्तर अर्घ्य पात्र में सरसों, अक्षत, कुशाग्र तिल यव गन्ध फल फूल सहित शुद्ध छाना हुआ जल डाले पाद्य पात्र में दूर्वा विष्णुपर्णी कमल तथा श्यामाक-साबा सहित जल डाले आचमनीय पात्र में इलायची लवंग, कंकोल तथा जायफल सहित जल डाले स्रानीय पात्र में कूठ मजीठ, हल्दी मोथा छडीला चम्पा वच कपूर तथा लमज्जक रस सहित जल डाले

तदेतदभावेतु तद्‌ वाक्योच्चारणपूर्वकं तुलसीदलमेव तत्तत्तोयपात्रे निक्षिपेत्‌ श्रीमन्त्रराजेन प्रत्येकं तत्तत्पात्रै संमन्त्र्य सुरभिमुद्रां प्रदर्श्य बामपार्श्वे पूर्णकुम्भं निधाय अन्यानि पूजाद्रव्याणि दक्षिणपार्श्वे निधाय मनसा स्वाचार्यमर्ध्यादिभिः सम्पूज्यतद्हस्तेनैवाराधनं स्वीकार्यमिति भगवते विज्ञाप्य

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१५२ गङ्गासहितः मिड... kT SN TURE प्राणायामत्रयं कृत्वा भगवदुत्थापनाय भगवन्तं प्रार्थयेत्‌

पूर्वोक्त उन सभी वस्तुओं के अभाव में उन-उन वस्तुओं का नाम लेकर अर्घ्यांदि पात्रों में केवल तुलसी सहित जल डाले इसके वाद अर्घ्यादि सभी पात्रों को श्रीतारक मन्त्र से संमन्त्रित करके सुरभिमुद्रा दिखाकर अपनी वाम भाग में शुद्ध जल से भरा पात्र तथा अन्य पूजन की समस्त सामग्री को अपनी दाहिने भाग में रखकर अपने आचार्यजी की अर्ध्यादि से मानसिक पूजन करके श्रीआचार्यदेवजी के द्वारा ही मानसिक भावना से पूजन वस्तुओं को आरध्य देव को समर्पण करे तात्पर्य यह कि भगवन्‌ ? मैं तो अल्पज्ञ हूँ अतः आपकी आराधना में पूर्णतया असमर्थ हूँ अतः हमारे श्रीआचार्य देव के द्वारा ही आप मेरी आराधना को स्वीकार करें इसप्रकार प्रार्थना करके तीन वार प्रणायाम करके आराध्य देव को शयन से उठाने के लिए इन निम्न लिखित श्लोकों द्वारा अति विनम्र भाव से प्रार्थना करे> कौशल्यासुप्रजाराम ? पूर्वासन्ध्या प्रवर्तते उत्तिष्ठ नरशार्दूल ? कर्तव्यं दैवमाह्निकम्‌ ॥१॥ उत्तिष्छोत्तिष्ठभद्रं ते त्यजनिद्रां जगत्पते ? त्वदीयोत्थानमात्रेण उत्थितं भूवनत्रयम्‌ ॥२॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ श्रीराम ? भद्रं ते करुणानिधे ? | उत्तिष्ठजानकीकान्त ? त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥३॥ | अप्रेमयकृपासिन्धुस्वरूपे ? रामसुप्रिये ? सुप्रभातानिशा सीते ? श्रीरामाभिमुखीभव ॥४॥ श्रीभगवद्रामचन्द्राभिमतानुरूपगुणविभवैश्वर्यशीलाद्यनवधिकातिसयासंख्येय कल्याणगुणगणां पद्मवनालयां पद्माननां पदादलायताक्षीं नित्यानपायिनीं भगवतीं निरवद्यां श्रीसीतां श्रीरामदिव्यमहिषीमखिलजगन्मातरमशरणशरण्याम नन्यशरणः शरणमहं प्रपद्ये स्वशेषभूतेन मया स्वीयैः सर्वपरिच्छदैः विधातुं प्रीतमात्मानं देवः प्रक्रमते स्वयम्‌ इतिश्लोकञ्चानुसन्धाय पञ्चोपनिसन्र्यासं कुर्यात्‌ अनन्य पतिव्रता श्रीकोशल्यादेवीजी के सुपुत्र सर्वेश्वर श्रीरामजी ? प्रात: कालिन सन्ध्या का समय हो रहा है अतः हे नरशार्दूल श्रीरामजी ? आप शैया से उठें कारण |

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श्रीरामार्चनपद्धति: १५३

“ळा... जि रा हातमा होरहा हि अत: देवाराधनादि दैनिक क्रियाओं को सम्पादन करना हे क्रियाओं को सम्पादनार्थ आपका शरणापन्न यह सेवक उपस्थित हे अत: सर्वेश्वर श्रीरामजी ? आप जागें ॥१॥ हे जगत्पति श्रीरामजी ? आप निद्रा को त्यागकर जग जाएं सुकोमल शैया को त्यागकर उठ जाएं हे जगन्नियन्ता ! आपका कल्याण हो प्रभो ? आपके उत्थान यानी उठ जाने से तीन लोक उठ जायगा अर्थात्‌ तीनों लोक के जीव जगकर अपनी-अपनी नित्य नैमित्तिक प्रवृत्तियों में लगजायेंगे अतः लोगों की सत्प्रवृत्त के लिए आप जागें ।२। हे श्रीरामजी ? आप जागें हे करुणा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ? आप जग जाए प्रभो ? आपका कल्याण हो हे जानको कान्त श्रीरामजी ? आप उठ जाए उठकर तीनों लोकों का कल्याण करें ॥३॥ अमित कृपा के सिन्धु स्वरूप हे जानकीजी ? हे श्रीरामप्रिया श्रीसीताजी ? प्रातःकाल हो गया है अतः सर्वेश्वरी हे सीताजी ? उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर सर्वेश्वर श्रीरामजी के अभिमुख-संमुख हो जांय तथा श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा के अनुसार सव कृत्य सम्पादन करावें ॥४॥

अनन्त ऐश्वर्यशाली सर्वेश्वर श्रीरमजी के अनुरूप गुण विभव ऐश्वर्य आदि अनवधिकातिशय अर्थात्‌ सर्वोत्कृष्ट परमावधि से रहित उत्कृष्ट वाली यानी सर्वोत्तम ऐश्वर्यशाली तथा असंख्येय यानी अनन्त कल्याणगुण समुदायों से सम्पन्न तथा दिव्य कमल वनों में आवासशील दिव्य कमल के समान मुख कमल वाली और दिव्य कमलदल पत्र के समान अति सुन्दर सर्वजन मोहक आँख वाली तथा नित्य अनपायिनी अर्थात्‌ अनवरत सर्वदा सर्वकाल देश आदि में एकरूप से स्थिर रहनेवाली भगवती यानी उत्त्पत्ति प्रलय अगति गति विद्या अविद्या प्रभृति प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पृक्त तथा निरवद्य यानी कर्म से होनेवाले संकोच विकाश आदि सर्वदोषों से सर्वदा रहित रहनेवाली सर्वेश्वर श्रीरमचन्द्रजी से सर्वदा अभिन्न रहनेवाली श्रीरामजी को दिव्य पत्नी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी जो सम्पूर्ण जगत्‌ को माता शरण रहित सव जीवों को अपने शरण में रखकर सर्वदा के लिए अभय करनेवाली सर्वेश्वरी श्रीसीताजी हैं उनके शरण में अन्य शरण रहित मैं जाता हूँ, अर्थात्‌ अन्य शरण रहित शरणागत सव जीवों को संसार भय से मुक्तकर देनेवाली सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के शरण में में जाता हूँ सर्वेश्वर श्रीरामजी के आराधना करने में मेरे जैसे अल्पज्ञ जीव को गति ही क्या अतः परम कारुणिक सर्वशरण्य श्रीरामचन्द्रजी अपने शेष स्वरूप मेरे तथा श्रीरामजी के नित्य

२०

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मेरे जैसे संसार चक्र में पतित जीव का उद्धार करने के लिए स्वयं ही शुभ कार्यारम्भ कर रहे हैं इसप्रकार एकान्तिक रूपसे अनुसन्धान-ध्यान करके पञ्चोएनिषद्‌ वाक्यों का न्यास करें वे इसप्रकार से हैं-

3 षां नमः पराय परमेष्ठ्यात्मने नमः इति शिरसि ॥१॥

यां नमः पराय पुरुषात्मने नमः इति नासाग्रे ॥२॥

रां नमः पराय विश्वात्मने नमः इति हृदये ॥३॥

3७ वां नमः पराय निवृत्त्यात्मने नमः इति गुह्यो ॥४॥

लां नमः पराय सर्वात्मने नमः इति पादयो ॥५॥

षां नमः पराय परमेष्ठ्यात्मने नमः इस मन्त्र को बोलकर शिर का स्पर्श करना यां नमः पराय पुस्त्रात्मने नमः इस मन्त्र को वोलकर नाक के अग्र भाग का स्पर्श करना ३» रां नमः पराय विश्वात्मने नमः इस मन्त्र को वोलकर हृदय का स्पर्श करना ३७ वां नमः पराय निवृत्त्यात्मने नमः इस मन्त्र को वोलकर गुह्य गुप्ताङ्ग का स्पर्श कर हाथ धोवें 3७ लां नमः पराय सर्वात्मने नमः इस मन्त्र को वोलकर दोनों पैरों का स्पर्श करना एवं पञ्जोपनिषद्‌ न्यासं विधाय श्रीमन्त्रराजन्यासं कुर्यात्‌

3 रां ज्ञानाय हृदयाय नमः 3 नमः ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ३» रामाय शक्त्यै नमः शिखायै वषट्‌ ३० बलाय कवचाय हुम्‌ ३७ तेजसे नेत्राभ्यां बौषट्‌। ३» रामाय विर्याय-अस्त्राय फट्‌

पूर्व में बताये अनुसार पञ्चोपनिषद्‌ वाक्यों का न्यास करने के वाद निचे बताये अनुसार से श्रीमन्त्रराज का न्यास करे रां ज्ञानाय हृदयाय नमः ऐसा बोलकर हृदय प्रदेश का स्पर्श करे ३% नमः ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ऐसा बोलकर शिरका स्पर्श करे। रामाय शक्त्यै नमः शिखायै वषट्‌ ऐसा बोलकर शिखा का स्पर्श करे। ३% बलया कवचाय हुम्‌ ऐसा बोलकर दोनों हाथों के मूल भाग का परस्पर में स्पर्श करे तेजसे नेत्राभ्यां वौषट्‌ ऐसा बोलकर दोनों नेत्रों का स्पर्श करे ३% रामाय वीर्याय अस्त्राय फट्‌ ऐसा बोलकर दक्षिण हाथ को शिर पर घुमाकर ताली बजावें

इति मन्त्रराजन्यासमनुष्ठाय पूर्वस्थापितस्ववामपार्श्वस्थपूर्णकुम्भे श्रीरा ममन्त्रोच्चारणपूर्वकै तुलसीदलं निक्षिप्य श्रीमन्त्रराजेनैवाभिमन्त्य तज्जले

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= > || __5+ श्रीरामार्चनपद्धति: १५५

याणि कोण पडलो पडक्षरमन्त्रोच्चारणपूर्वकं प्रपूर्य उद्धरणयार्घ्यादि | समुद्धृत्यपूर्णकुम्भेनिक्षिपेत्‌ तत उद्धरण्याध्यसलिलमादायनासाग्रपर्यन्तमुर त्थृत्य ३७० विरजे आगच्छागच्छेति सप्तकृत्वा उक्त्वा तत्तोयेनात्मानं पूजोपकरणानि यागभूमिं प्रोक्ष्यापशिष्टमन्यत््य प्रक्षिपेत्‌ पूर्वोक्त रीति से श्रीमन्त्ररज का न्यास करने के वाद अपने वाम भाग में पहले रखे पूर्ण कुम्भ में श्रीराममहामन्त्र का उच्चारण करते हुये तुलसीदल को डाले पुनः श्रीराममन्त्र से ही अभिमन्त्रित करके उसी जल से अर्घ्यादि पञ्चपात्रों को अर्घ्यपात्र के क्रम से षडक्षर श्रीमन्त्राज के उच्चारण पूर्वक पढकर पुनः दक्षिणावर्त शङ्क या आचमनीय से पाचों पात्रों से थोडा-थोडा जल निकाल कर पूर्ण कुम्भ में डाल दें इसके वाद दक्षिणावर्त शङ्ख या आचमनी से अर्घ्यपात्र से जल लेकर अपने नाक के आगे तक ऊपर उठाकर ३% विरजे आगच्छ आगच्छ इस आवाहन वाक्य को सात वार बोलकर उस जल से अपना देह एवं सव पूजा की सामग्री यागभूमि-मन्दिर को भी प्रक्षालन-सिंचन करके अवशिष्ट जल को अन्यत्र डाल दे ततस्तुलसीदलं समादाय हरिः 3& साकेतं दिव्यलोकं सुरतरुमतुलं तत्र रत्नालिगर्भ हैमं सिंहासनं तच्छुभरुचिनिचयं भानुकोटिप्रकाशम्‌ पदां चानेकपत्रं कपिनिकरपर्ति पादुके वातजातं सुग्रीवान्‌ द्वारपालान्‌ नलगवयमुखान्‌ रामभक्तान्‌ प्रपद्ये ॥९॥ वामं पादं प्रसार्याश्रितकलुषहरं दक्षिणं कुञ्चयित्वा जानुन्याधाय दिव्ये रिपुकुलदमने बाणचापे दधत्सः रामः पाणिद्वयेन प्रतिभटभयदः पदागर्भारुणाक्षो देवीभूषादिजुष्टो वितरतु जगतां शर्मसाकेतनाथः ॥२॥ इति पद्यैरित्थमनुसन्धाय श्रीसीतासमेत भगवच्छीरामचन्द्रचरणारविन्दे तत्प्रक्षिपेत्‌ | अनन्तर तुलसीदल को हाथ में लेकर हरिः 3 इसप्रकार उच्चारण कर दिव्यलोक श्रीसाकेत में स्थिर वर्णनातीत कल्पवृक्ष के निचे रत्न समूह से रचित दिव्य सुवर्ण सिंहासन जो कि करोडौँ सूर्य के प्रकाश से भी अधिक प्रकाशवाला तथा

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१५६ गङ्गासहितः

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नस पन कल्याण प्रद और जनमन मोहक है उसके मध्य में अनेक पत्रवाले लक कमलासन में विराजमान सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी हैं जिनके चारों तरफ कपि सेनापतियो का समूह स्थित है तथा श्रीरामजी के चरणारविन्द की सेवा करते हुये श्रीहनुमानजी हैं सुग्रीव नल नील आदि प्रधान-प्रधान लोग द्वारपाल के रूपमें स्थिर हैं ऐसे श्रीराम सेवा परायण श्रीरामभक्त तथा सर्वेश्वर श्रीरामजी के शरण में में हूँ यानी सपरिकर श्रीरामजी को सादर प्रणाम करता हूँ ॥१॥ सम्पूर्ण कलुष कल्मष पाप के अपहरण करनेवाले वाम पाद को प्रसार्य-लम्बाकर लटकाकर तथैव सर्व पाप ताप संहारक दक्षिण पाद को मूढकर जानु के ऊपर रखकर विराजमान तथा दिव्य दोनों करकमलों से शत्रु कुल का दमन यानी नाश करनेवाले दिव्य धनुष और बाण धारण किये हुथे वे सर्वलोक प्रसिद्ध सर्वेश्वर श्रीरमजी जो कि कमल के बीच के भाग के समान अरुण यानी लाल आँख वाले प्रतिपक्षिवीरों को भय देनेवाले यानी दमन करनेवाले दिव्य महिषी श्रीसीताजी तथा अनेक दिव्य आभूषणों से सुशोभित दिव्यधाम श्रीसाकेतलोक के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सब संसार को कल्याण प्रदान करें ॥२॥ इत्यादि पद्मों से ऊपर वर्णित रूपसे ध्यान धरकर सर्वेश्वरी श्रीसीताजी सहित सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविन्दों में हाथ में ली हुई तुलसी आसन के रूपमें समर्पण करें अथैवमासनं कल्पयित्वा ओमाधारशक्त्यै नमः इति आधार शक्त्यै अर्घ्यादीनि समर्पयामि प्रकृत्यै नमः इति प्रकृत्यै अर्घ्यादीनि समर्पयामि ॐअखिलजगदा धाराय कूर्मरूपिणे नारायणाय नमः इति तस्मै अ०। ३» भगवतेऽनन्ताय नागराजाय नमः इति तस्मै अ०। ३» भूम्यै नमः इति तस्मै अ०। ३» श्रीसाकेताय दिव्यनगराय नमः इति तस्मै अ०। पुष्पकाय दिव्यविमानाय नमः इति तस्मै अ०। ३% श्रीसाकेताय दिव्यजनपदाय नमः तस्मै अ०। ३» आनन्दमयदिव्यरत्मण्डपाय नमः अ०। आस्तरणभूताय अनन्ताय नमः अ०। पूर्वोक्त क्रम से आसन को कल्पना करके निम्न प्रकार से आधार शक्ति आदि की पूजा करे आधार शक्त्यै नमः अर्घ्यादीनि समर्पयामि इस मन्त्र को बोलकर आधार शक्ति को पाद्य अर्घ्य आचमनीय आदि षोडशोपचार या यथा मिलितोपचार यानी सोलह पदार्थों से या जितने पदार्थ की शक्यता हो उतने ही पूजा की सामग्री

से पूजा करे अर्घ्यादि में आदि शब्द से अन्य पूजा द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये

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श्रीरामार्चनपद्धति: १५७

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इति प्रकृत्ये अर्ध्यादीनि समर्पयामि ऐसा बोलकर यथोपचार सामग्री से प्रकृति की पूजा करे तथैव अखिल जगदाधाराय कूर्मरूपिणे नारायणाय नम: ऐसा बोलकर निखिल ब्रह्माण्ड के आधारभूत कूर्मजी की पूजा करे भगवते अनन्ताय नारायणाय नमः इसप्रकार बोलकर सर्वोपचार से नागराज की पूजा करे भूम्यै नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से भूमिको पूजा करे ३७ श्रीसाकेत दिव्य नगराय नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से सवपिक्षया पर रूपसे स्थित दिव्य धाम श्रीसाकेतजी की पूजा करे पुष्पकाय दिव्यविमानाय नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्र्व्यों से दिव्य पुष्पक विमान की पूजा करे श्रीसाकेताय दिव्य जनपदाय नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यों से श्रीसाकेत नामक दिव्य जनपद की पूजा करे आनन्दमयाय दिव्यरलमण्डपाय नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से आनन्द स्वरूप दिव्यरत्न मण्डप की पूजा करे। आस्तरण भूताय अनन्ताय नमः ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यों से आस्तर स्वरूप यानी ऊपर का विछोना के रूपमें अनन्त की पूजा करे इसके वाद-

आग्नेय्यां दिशि धर्माय पीठपादाय नमः अ०। नैऋत्यां ज्ञानाय पीठपादाय नमः अ०। वामव्यां वैराग्याय पीठपादाय नमः अ०। ऐशाव्यां ऐश्वर्याय पीठपादाय नमः अ०। मध्ये ३० पीठभूताय अनन्ताय नागराजाय नमः ३० प्रच्यां अधर्माय पीठगात्राय नमः अ०। दक्षिणस्याम्‌ अज्ञानाय पीठगात्राय नमः अ०। पश्चिमायां अवैराग्याय पीठगात्राय नमः अ०। उत्तरस्यां ३» अनैश्वर्याय पीठगात्रा नमः अ०।

३% धर्माय पीठपादाय नमः इस मन्त्र का बोलकर प्रथम सिंहासन के अग्निकोण की अर्घ्यादि सर्वोपचार से पूजा करे 3 ज्ञानाय पीठपादाय नमः ऐसा बोलकर नैऋत्यकोण की पूजा करे ३» वैराग्याय पीठपादाय नमः ऐसा बोलकर वायव्यकोण की पूजा करे ३० ऐश्वर्याय पीठपादाय नमः ऐसा बोलकर ईशानकोण की पूजा करे पीठभूताय अनन्ताय नागराजाय नमः ऐसा बोलकर मध्य भाग की पूजा करे 3७ अधर्माय पीठगात्राय नमः ऐसा बोलकर सिंहासन के पूर्व भाग की पूजा करे ३७ अज्ञानाय पीठगात्राय नमः ऐसा बोलकर दक्षिण भाग की पूजा करे। ३% अवैराग्याय पीठगात्राय नमः ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा को पूजा करे

जो देशकाल तथा शक्ति कृ अनुसार जुटाई गई हो प्रकृत्यै नमः

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१५८ गङ्गासहितः

अनैश्वर्याय पीठगात्राय नमः ऐसा बोलकर उत्तर दिशा की पजा करे

एभिः पारच्छिन्नतत्वसदसदात्मकाय नमः अ०। ऋग्वदाय पीठवाहकाय नमः अ०। ३% यजुर्वेदाय पौठवाहकाय नमः अ०। ३» सामवेदाय पीठवाहकाय नमः अ०। 3 अथर्ववेदाय पीठवाहकाय नमः अ०। इत्थं गन्धपुष्पादिभिस्तान भ्यर्च्य प्रणमेत्‌

3७ एभिः परिच्छिन्नतत्त्वसदसदात्मकाय नमः ऐसा बोलकर अधर्म अज्ञान वैराग्य तथा अनैश्वर्य रूपमात्र से मुक्त कार्य तथा कारण स्वरूप पीठ तन्त्र की सर्वोपचार से पूजा करे पुनः ऋवेदाय पीठवाहकाय नमः ऐसा बोलकर पूर्व दिशा में ऋग्वेद को पूजा करे ३% यजुर्वेदाय पीठवाहकाय नमः ऐसा बोलकर दक्षिण दिशा में यजुर्वेद की पूजा करे ३% सामवेदाय पीठवाहकाय नमः ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा में सामवेद की पूजा करे ३% अथर्ववेदाय पीठवाहकाय नमः ऐसा बोलकर उत्तर दिशा में अथर्ववेद की पूजा करे ऊपर बताये अनुसार गन्धपुष्प अक्षत आदि यथोचित पूजा सामग्री से भगवान्‌ के सिंहासन को बहन करनेवाले बाहक रूप चारों वेदों की पूजाकर प्रणाम करे

अथ पीठवाहकोपरि ३» परिच्छिन्नतनवे पीठभूताय शुद्धात्मकायाऽनन्ताय नागराजाय नमः इति तस्मै अ०। तत्रानन्तोपरि अष्टदल पद्माय नमः इति तस्मै अ०। तहलेषु सूर्याय नमः अ०। केशरेषु ३७ सं सोममण्डलाय नम: अ०। कणिकायाम्‌ रं वह्निमण्डलाय नमः अ०।

पूर्व में बताये अनुसार वेदों की पूजा करने के वाद ३% परिच्छिन्नतनवे पीठभूताय शुद्धात्मकायाऽनन्ताय नागराजाय नमः ऐसा बोलकर पीठवाहक चारों वेदों के ऊपर पीठ स्वरूप शेष की सर्वोपचार द्रव्यं से पूजा करे पुनः अनन्त के ऊपर में अष्टदल पद्माय नमः ऐसा बोलकर अष्टदल कमल की पूजा करे ३» सं सूर्याय नमः ऐसा बोलकर अष्टदल कमल के दलों पत्तों पर सूर्यमण्डल की पूजा करे 3 सं सोममण्डलाय नमः ऐसा बोलकर कमल के केसरों में चन्द्रमण्डल की पूजा करे रं वह्निमण्डलाय नमः ऐसा बोलकर अष्टदल कमल के कर्णिका में अग्निमण्डल की पूजा करे

ह. वाया पल्य पूल विमलायै चामरहस्तायै उत्कषिण्यै चामरहस्तायै नमः इति अ०।

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श्रीरामाचनपद्धति: १५९

eo पदास्य दक्षिणदले ज्ञानरूपायै चामरहस्तायै नमः अ०। पदस्य नैऋत्यदले क्रियायै चामरहस्तायै नमः अ०। पदास्य पश्चिमदले योगायै चामरहस्तायै नमः अ०। पदास्य वायव्यदले सत्याये चामरहस्ताये नम: अ०। पदास्योत्तरदले 3 ्रब्ह चामरहस्तायै नमः अ०। पबास्यैशानदले ऐशानायै चामरहस्तायै नमःअ०। पूर्वोक्त प्रकार से अष्टदल कमल में तीनों मण्डल का शान्तचित्त से ध्यान कर

यथोपचार पूजा करके विमलायै चामरहस्तायै नमः इस मन्त्र को बोलकर कमल के पूर्व भाग के दल में हाथ में चमर ली हुई विमलाजी की अर्घ्यादि से पूजा करे तथैव उत्कषिण्ये चामरहस्तायै नमः इस मन्त्र को बोलकर कमल के अग्निकोण के दल में चमर हस्ता उत्कर्षिणी की अर्ध्यादि से पूजा करे 3% ज्ञानरूपायै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के दक्षिणदल में चमर ली हुई ज्ञानरूपा को अर्घ्यादि रूपसे पूजा करे क्रियायै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के अऋत्यकोण के दल में हाथ में चमर ली हुई क्रिया शक्ति की अर्घ्यादि से पूजा करे। योगायै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के पश्चिम दल में हाथ में चमर ली हुई योगशक्ति की अर्ध्यादि से पूजा करे | ३2 सत्यायै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के वायव्यकोण वाले दल में हाथ में चमर ली हुई सत्य स्वरूपा शक्ति की अर्घ्यादि से पूजा करे प्रह्मै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के उत्तर तरफ के दल में हाथ में चमर ली हुई प्रह्मी नामक शक्ति की अर्घ्यादि से पूजा करे ऐशानायै चामरहस्तायै नमः ऐसा बोलकर कमल के ईशान वाले दल में हाथ में चमर ली हुई ऐशानीरूपा शक्ति की अर्ध्यांदि से पूजा करे अनन्तर-

भगवतोऽग्रे कर्णिकायाः पूर्वभागे अनुग्रहायै नमः अ०। पद्मस्य कर्णिकायां जगत्प्रकृतये दिव्ययोगपीठवाहकाय नमः अ०। दिव्ययोगपीठ वाहकोपरि ३2 दिव्ययोगपीठाय नमः अ०। योगपीठे ३» दिव्ययोगपर्यङ्काय नमः अ०। पर्यङ्कोपरि सहस्त्रफणशोभिताय नमः अ०। पुरो ३» भगवत्पादपीठाय नमः अ०। तदुपरि भगवत्पादुकाभ्यां नमः अ०।

अनुग्रहायै नमः इस मन्त्र को बोलकर भगवान्‌ श्रीरामजी के आगे अष्टदल कमल की कणिका के पूर्व दिशा में अनुग्रहा रूपा शक्ति की अर्घ्य आदि सर्वोपचार ्रव्यों से पूजा करे जगत््रकृतये दिव्ययोगपीठवाहकाय नमः ऐसा बोलकर अष्टदलकमल के कणिका में दिव्य योगपीठ वाहक की अर्घ्य आदि से पूजा करे।

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RR

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१६० गङ्गासहितः

दिव्ययोगपीठाय नमः ऐसा बोलकर दिव्ययोगपीठवाहक के ऊपर दिव्ययोगपीठ की अर्घ्य आदि से पूजा करे ३& दिव्ययोग पर्यङ्काय नमः ऐसा बोलकर योगपीठ पर दिव्ययोग पर्यङ्क की अर्घ्य आदि से पूजा करे सहस्रफणशोभिताय नागराजाय नमः ऐसा बोलकर पर्यङ्क के ऊपर सहस्रफण से शोभित नागराज को अर्घ्य आदि से पूजा करे भगवत्‌ पाद पीठाय नमः ऐसा बोलकर भगवान्‌ के सामने भगवान्‌ के पादुका पीठ की अर्घ्य आदि से पूजा करे भगवत्पा- दुकाभ्यां नमः ऐसा बोलकर पादुका पीठ के ऊपर भगवान्‌ के दिव्य पादुका-खडाउ की अर्ध्य आदि से पूजा करे | अथतादुशाष्टदलपदास्थपर्यङ्कस्थितानन्तोपरि- प्रपन्नाभिष्टसंदोहश्रीराम? करुणानिधे ?। शिवशेषाद्यविज्ञेयाशेषमाहात्म्य राघव? तादुश्यासीतयाऽऽगच्छपार्षदेन सहप्रभो?।आज्ञां क्रियस्वदासस्यप्रपन्नस्यार्चनायमेर

इतिश्रीसीतासहितमप्रमेयकृपारत्नाकरं भगवन्तं साङ्गं सायुर्धं सपरिवारं सवाहनं स्वशक्तियुक्तं श्रीरामचन्द्रमावाह्य पुष्पाञ्जलिं तस्मै प्रदाय पूर्वस्थापि तार्घ्यपात्रादुद्ध रण्यार्घ्यजलमादाय श्रीसीतासमेतायाप्रमेयकृपारत्ना कराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः मध्ये रां रामाय नमः वामे श्रीं सीतायै नमः इति तत्तन्मन्त्रैः पृथक्‌ पृथक्‌ वा अर्ध्यं समर्पयामीत्युक्त्वा भगवतो दक्षिणहस्तं ्रोक्षन्निव विभाव्य तज्जलं पतनपात्रे प्रक्षिपेत्‌

पूर्व कथित विधान से भगवान्‌ के पादुकान्त पूजा हो जाने के वाद पहले वर्णित अष्टदल कमल में स्थित अनन्त के ऊपर निम्नरूप से सपरिकर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी का आवाहन करे शरण में आये हुये सभी जनों के इच्छित पदार्थ को देनेवाले हे करुणा के खजाने सर्वेश्वर श्रीरामजी ? शिव शेषनाग सर्वदेव समूह सरस्वती प्रभृति से सर्वदा प्रयत्न करने पर भी आपका सम्पूर्ण माहात्म्य नहीँ जाना जा सका ऐसे अनन्त महात्म्यशाली रघुकुलश्रेष्ठ हे श्रीराघवजी ? सर्वसमर्थ प्रभो श्रीरामजी ? आप से अभिन्न स्वरूपा नित्य सहचारी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी तथा पार्षदों के साथ पधारें तथा आपके शरण में आये आपका नित्य किंकर मुझे आपको पूजा करने के लिए आज्ञा प्रदान करें इसप्रकार प्रार्थना पूर्वक सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के साथ अप्रमय अमित कृपा के समुद्र सर्वेश्वर श्रीरमचन्द्रजी को आयुध-दिव्या्र धनुष बाण आदि सपरिवार बाहन अनन्तानन्त अपनी शक्तियों के साथ श्रीरामचन्द्रजी को आवाहन करके पुष्पाञ्जलि श्रीचरणों में समर्पण करके पहले से स्थापित अर्घ्यपात्र दक्षिणावर्त

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श्रोरामार्चनपद्धति: १६१

V८. क?“ शङ्ख या आचमनी से अर्घ्य जल लेकर ३% श्रीसीतासमेताय अप्रमेय कृपारलाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः इस मन्त्र को बोलकर श्रीरामजी का दाहिना हाथ प्रक्षालन को भावना से अर्घ्य समर्पयामि ऐसा कहते हुये हाथ में लिया अर्घ्य जल पतनपात्र यानी तरभाणी में गिरा दें। अनन्तर पाद्य आदि यथा मिलित पूजा द्रव्यों का नाम लेकर सभी वस्तुओं से पूर्व क्रम से ही पूजा करे अथवा दिव्यासन के मध्यभाग में रां रामाय नमः इस महामन्त्र से सर्वेश्वर श्रीरामजी का सर्वोपचारों से पूजा करे तथैव श्रीरामजी के वामभाग में श्री सीतायै नम: इस मन्त्र से श्रीसीताजी की आवाहन तथा पूजा करे। यहां यह खयाल रखना चाहिये कि यदि आचमनी एक ही हो तो उसे शुद्ध जल से प्रक्षालन-धोकर ही अर्घ्यपात्र से पाद्यपात्र में तथा पाद्यपात्र से आचमन पात्र में डालना चाहिये अलग-अलग पात्रो के लिए अलग-अलग आचमनी को व्यवस्था हो तो अति उत्तम तत उद्धरणी शुद्धजलपात्रजलेन संप्रक्षाल्य ततस्तया पाद्यजलपात्रात्‌ पाद्यजलमादाय तदेव वाक्यं समुच्चार्य पाद्यं समर्पयामीतिवदन्‌ भगवतः पादौ प्रक्षाल्येब विभाव्य तज्जलं पतनपत्रे द्विः प्रक्षिपेत्‌ शुद्धजलपात्रस्थजलेनोद्वरणीं प्रक्षाल्य आचमनपात्रात्तज्जलमादाय तदेव वाक्यं समुच्चार्य आचमनं तस्मै / समर्पयामीतिवदन्‌ भगवतो मुखकमलसमीपे प्रदर्श्य तज्जलं पतनपात्रे त्रिः प्रक्षिपेत्‌ | पुनः शुद्धजल पात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन करके आचमनी से पाद्य जलपात्र से पाद्य जल लेकर ३» श्रीसीतासहितायाऽप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते | श्रीरामचन्द्राय नमः इसप्रकार बोलकर या पूर्वोक्त क्रम से श्रीरामजी तथा श्रीसीताजी के अलग-अलग उन-उन मन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवान्‌ के श्रीचरणकमलों की प्रक्षालन की है ऐसी भावना करके पाद्यं समर्पयामि बोलकर श्रीचरणों में दृष्टि रखकर पतनपात्र में दो वार उस जल को गिरा दें फिर शुद्ध जलपात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन करके आचमनी में आचमन पात्र से जल लेकर ३% श्रीसीतासहितायाऽप्रमेयकृपारलाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः इसप्रकार बोलकर श्रीमुखारविन्द के समक्ष दृष्टि करके आचमनीय जल को भी श्रीमुखकमल के समक्ष करके मैं भगवान्‌ को आचमन करा रहा हू ऐसी भावना कर ''आचमनीयं

समर्पयामि” ऐसा बोलते हुये आचमनीय जलको पतनपात्र में तीन वार गिरा दें २१

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१६२ ' गङ्गासहितः

उद्वरणीं पूर्ववदेव प्रक्षाल्य शुभ्ववस्रेण हस्तकमलमुखकमलेसंमृज्य शाटिकोत्तराग्रेण पादौ प्रत्येकं संमृज्य षोडशोपचारान्‌ समर्पयामौति पुष्पाञ्जलिं प्रदाय उद्वरण्याः पूर्णकुम्भात्सलिलमुधत्त्य क्षीरफलगुडपूर्णध्यात्वा तदेव समुच्चार्य मधुपर्क समर्पयामीति वदन्‌ निवेद्य पतनपात्रे प्रक्षिप्य पूर्ववदुद्धरणी प्रक्षाल्य पूर्ववदेवाचमनं प्रदाय शाट्या पूर्ववत्समृज्य स्नानार्थ पादुके समर्पयामीति पुष्पाञ्चलि भगवते प्रदाय पूर्ववदेवार्घ्याद्युपचारान्‌ प्रदाय स्नानेशाटी मनसाध्यात्वा तुलसीकाष्ठेन तद्वाक्योच्चारणपूर्वकम्‌ दन्तधांवनमाचरंन्निव विभाव्य स्वहस्तं प्रक्षाल्य शुद्धजलपात्रतोयेन मन्त्रोच्चारणपूर्वकं ` गण्डूषं समर्पयामीति तज्जलं षट्कृत्वः पतनपात्रे प्रक्षिप्य पुनरपि तज्जलेन मुखशोधनम्‌ समर्पयामीति मुखाम्बुजशोधनमाचरन्निव विभाव्य तज्जलं पतनपात्रे प्रक्षिप्य पूर्ववत्पाद्याचमने प्रदाय ताम्बूलं प्रदाय अभ्यड्भोद्वर्तनचूर्णं प्रदाय अभ्यङ्ग स्नानमाचरन्निव विभाव्यस्नानपात्रं मूर््नि निधाय स्नानीयंपात्रजलेन पुस्ष सूक्तादिकमनुसंदधत्‌ ' भगवन्तं स्त्रापयित्वा स््रानशाट्या ' संमृज्यं ' सिंहासने स्थापयित्वा तद्वाक्येनेव गन्धपुष्पधूपदीपादिकं समर्पयामीतिं वदन्‌गन्धादिकँम्‌ भगवते समर्पयेत्‌ | रि एति FTES अनन्तर पहले के समान ही आचमनी को शुद्ध जल से प्रक्षालनं कर स्वच्छे सफेद वस्त्र के एक भाग से भगवान्‌ के हस्तकमल तथा मुखकमल पोंछने की भावनां करते हुये मुखारविन्द तथा हस्तकमलों के सक्षम में समुपस्थापित करें पुन: हाथ में तुलसी तथा पुष्पों को लेकर ३% ' श्रीसीतासहितायाप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः इस मन्त्र को बोलकर 'षोडशोपचारान्‌ समर्पयामि ऐसा बोलकर षोडशोपचार को भावना से श्रीचरणकमलों में पुष्पाञ्जलि समर्पण कर दें अनन्तर आचमनी से पूर्ण कुम्भ से शुद्ध जल लेकर दूध फूल तथा गुंड से पूर्ण हे 'ऐसो ध्यान कर श्रीसीतासहितायाप्रमेय कृपारलाकराय भगवते श्रीरामाय नम: 'इंसंकी . बोलकर मधुपर्क समर्पयामि ऐसा बोलकर पतनपांत्र में गिरा दे पुन: आचंमनी को प्रक्षालनकर पूर्व के समान ही भगवान्‌ को आचंमन कराकर पहेले के समान ही शुभ्रवत्र से हस्त कमल तथा मुखकमल चरणकंमलों को पोंछने को, भाव॑नाकर वश की भगवान्‌ के सम्मुख करे। अनन्तर हाथ में पुष्प लेकर भगवान के रान कें लिए पादुका का समर्पण करता हूँ ऐसी भावनाकर ' भंगवान्‌ के 'श्रीचरंमो में याल

हु

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श्रीरामार्चनपद्धतिः १६३

^

नकल 5 9 \_ 3 >> मा समर्पण करे तब पर्व दे नानयलालकलालाललललाललटुलललललकककटसक्न्ट = sear हत अर्घ्य पाद्य समर्पण कर आचमन करा के नानार्थ दन्तधा वनं समर्पयामि ऐसा ब्रोलकर नकर पूर्व के समान ही मन्त्र का उच्चारण करके लकर तुलसी काष्ठ से भगवान्‌ को दन्तधावन करा रहा हूँ ऐसी भावना करके उस काष्ठ को पतनपात्र में रखकर अपने हाथ को धोकर शुद्ध जलपात्र से आचमत्नी से जल लेकर पूर्व के समान मन्त्र को बोलकर गण्डूषं समर्पयामि ऐसा. बोलकर जल को छः वार पतनपात्र में गिग दे 0 'पुनः,आचमनी से शुद्ध जल लेकर पूर्व के समान ही मन्त्र को बोलकर मुखशो धनं समर्पयामि ऐसा बोलकर शुद्ध जल से मुखारविन्द प्रक्षालन को भावनाकर उस जल को प्रतनपात्र मे गिरा दे पुनः अर्घ्यपाद्य आचमन. कराने के वाद, पूर्व के समाज ही मन्त्र को पढकर ताम्बूलं समर्पयामि ऐसा बोलकर ताम्बूल समर्पण करने के वाद अभ्यङ्गः स्नान के. लिए तेल तथा उवटन आदि हाथ-में लेकर यह मानसिक भावना करके भगवान्‌ के दिव्य अंगों में मैं सुगन्धित द्रव्यादि लगा रहा; हूँ ।.इसके वाद अभ्यङ्ग खान सम्पादन करने की भावना से स्नान पात्र को-मस्तक में स्थापित॒क़र उस शुद्ध जल से हरिः 3 सहस्रशीर्षा पुरुष: इत्यादि पुरुषसूक्त के मन्त्रों को पढते हुये भगवान्‌: को. स्नान कराकर खान. शाटि शुद्ध -शुभ्रवसत्र -से अच्छी -तरह से-पोंछकर सिंहासन में विराजमान करा दे | अनन्तर श्रीसीतासहितायाप्रमेय:कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय-नमः इस; मत्र.को. बोलकर गन्धं समर्पयामि इसप्रकार बोल कर गन्ध का. समर्पण. करे।। तथैव पुष्पं समर्पयामि बोलते हुये पुष्प तथा ,भ्रूप-दीप नैवेद्य-ताम्बूल एला लवङ्ग-सुगन्ध द्रव्य आदि नामों को अलग-अलग बोलकर यथा, मिलित, सभी द्रव्य.-भगवान्‌ऽ को सादर समर्पण करे ।05एाएक कछ 5उ? रि तत: “पात्रावशिष्टजलेतश्री,श्रियैः-ज्ञमः लीं./लीलावे. नमः भू भूम्यै नमः इतिः मन्रोच्चारणेनार्घ्यादिक| प्रदाय ततः-ॐ किरीटाय मुकुटाधिपतये-नमः-अ०। ,दक्षिणकुएडलायः मकरात्मत्ते नमः, अ०। ॐ१-वामकुण्डलाय, मकरात्मने त्तम; अ०। ॐ; बैजयन्तीमालायै. श्रीतुलस्यै नमः -अ०। ॐ, वत्साय श्रीनिवासाय नमः अ०।...ॐ._कौस्तु भासरताघ्रिपतमे णमः अ९।।-२; काञ्जीणुणोज्ज्वलाय् दिव्यपीताम्बराय नमः अ०।,ॐ सर्वेभ्यो (भगवद्‌ दिव्यविभूषणोभ्यो नमः अ०॥ इति. भगवद्धषणानि अर्घ्यादिभिरभ्यचेत्‌ काऽ फा 0 पा ।पूर्ोक-प्रकार से;भावानूएक्री पूजा सम्पादनको के-वाद झर्घ्यादि पीर

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१६४ गङ्गासहितः TA बचे हुये जल से श्रीं श्रियै नमः इस मन्त्र को बोलकर श्रीदेबीजी की अर्घ्यादि सभी पदार्थों से पूजा करे तथैव लीं लिलायै नमः इस मन्त्र को बोलकर लीलादेवी की और भूं भूम्यै नमः इस मन्त्र को बोलकर भू देवीजी की सभी अर्घ्यादि सामग्री से पूजा करे पुनः 3७ किरीटाय मुकुटाधिपतये नम: इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यपाद्य आचमनीय स्रानीय गन्ध पुष्पादि से किरीट मुकुट की पूजा करने के वाद ३% दक्षिण कुण्डलाय मकरात्मने नमः इस मन्त्र को बोलकर पहले के समान ही अर्ध्यादि सामग्री से दक्षिण कुण्डल की पूजा करके वामकुण्डलाय मकरात्मने नमः इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही तरह से ही वामकुण्डल की पूजा करे तब वैजयन्तीमालायै श्रीतुलस्यै नमः इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यादि सभी वस्तुओं से वैजयन्ती माला की पूजा करने के वाद ३% श्रीवत्साय श्रीनिवासाय नमः इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के समान ही सभी अर्घ्यादि से श्रीरामचन्द्रजी के वक्ष्यस्थल में स्थित सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के निवास स्थानभूत श्रीवत्स की पूजा करे इसके वाद ३» कौस्तुभाय रत्नाधिपतये नमः इस मन्त्र को बोलकर पहले के समान ही अर्ध्यादि समस्त सामग्री से श्रीरामजी का भूषण कौस्तुभमणि की पूजा सम्पादन करे अनन्तर काञ्जीगुणोज्ज्चलाय दिव्यपीताम्बराय नमः इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही समान अर्घ्यादि सभी वस्तुओं से श्रीरामजी के दिव्य परिधान पीताम्बर की पूजा करें। इसके वाद सर्वेभ्यो भगवद्‌ दिव्यविभूषणेभ्यो नमः इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही तरह से समस्त अर्ध्यादि द्रव्यो से श्रीरामचन्द्रजी के समस्त दिव्य आभूषणों को एक ही साथ में पूजा करें ततोऽ्याद्येकैकपात्रस्थ जलेन क्रमशः ३शाङ्र्गाय सबाणाय चापाधि पतये नमः अर्ध्यानि समर्पयामि सुदर्शनाय हेतिराजाय नमः अ०। ३ॐ पाञ्ज जन्याय शंखधिपतये नमः अ०। कौमोदक्यै गताधिपतये नम: अ०। ३ॐ नन्द काय खड्गाधिपतये नमः अ०। इति भगवतो दिव्यायुधानि अर्घ्यादिभिरभ्यचेत्‌ बोलकर सर्वेश्वर श्रीरामजी के आयुध जा पत लमी दलपत साप दों अता एव धनुष का अर्घ्य आदि सभी द्रव्यों पूजन करे अनन्तर सुदर्शनाय हेतिराजाय नम: अर्घ्यपाद्यादि सभी सामग्री से भगवान्‌ के दिव्य RE I आयुध सुदर्शन चक्र की पूजा करे।

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SSS

श्रीरामार्चनपद्धतिः १६५

22३ स्स्स <<< <<< इसी प्रकार से ३७ पाञ्चजन्याय शङ्खाधिपतये नमः इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से पाञ्चजन्य शङ्ख को पूजा करे पुनः ,3% कौमोदक्यै गदधिपतये नमः इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यादि से गदा की पूजा करने के वाद नन्दकाय खड्गाधिपतये नमः इस मन्त्र को बोलकर खड्ग की अर्ध्यादि से पूजा करें

ततस्तथैव 3७ लं लक्ष्मणाय नमः अ०। भं भरताय नमः अ०। शं शत्रुघ्नाय नमः अ०। हुँ हनुमते नमः अ०। सुं सुग्रीवाय नमः अ०। ३० वं विभौषणाय नमः अ०। जं जाम्बते नमः अ०। ३७ नं नलाय नमः अ०। नी नीलाय नमः अ०। गं गवाक्षाय नमः अ०। गं गवाय नमः अ०। कं केसरिणे नमः अ०। ३» सं सुषेणाय नमः अ०। सर्वेभ्यो भगवत्प रिजनपरिचर प्रभृतिभ्यो नमः अ०। इति भगवत्परिजनानर्घ्यादिभिरभ्यर्चेत्‌

सर्वेश्वर श्रीरामजी के दिव्य आयुध धनुष बाण आदि के पूजन के वाद पूर्वोक्त क्रम से ३७ लं लक्ष्मणाय नमः इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यादि से श्रीलक्ष्मणजी को पूजा करे 3७ भं भरताय नमः बोलकर अर्घ्यादि से श्रीभरतजी की पूजा करे ३» शं भत्रुघ्नाय नमः बोलकर अर्घ्यादि से श्रीशत्रुघ्नजी की पूजा करे हुं हनुमते नमः बोलकर श्रीहनुमानजी की अर्घ्यादि से पूजा करे सुं सुग्रीवाय नमः इस मन्त्र से श्रीसुग्रीवजी की अर्घ्यादि से पूजा करे बं विभीषणाय नमः इस मन्त्र से श्रीविभीषणजी की अर्घ्यादि से पूजा करे जं जाम्बवते नमः इस मन्त्र से श्रीजाम्बवन्तजी की अर्घ्यादि से पूजा करे। नं नलाय नमः इस मन्त्र से श्रीनलजी की अर्घ्यादि से पूजा करे नीं नीलाय नमः इस मन्त्र से श्रीनीलजी की अर्घ्यादि से पूजा करे। गं गवाक्षाय नमः इस मन्त्र से श्रीगवाक्षजी की अर्ध्यादि से पूजा करे ३% गं गवाय नमः इस मन्त्र से श्रीगवजी को अर्घ्यादि से पूजा करे कं केसरिणे नमः इस मन्त्र से श्रीकेसरीजी की अर्घ्यादि से पूजा करे ३७ सं सुषेणाय नमः इस मन्त्र से श्रीसुषेणजी की अर्घ्यादि से पूजा करे ३» सर्वेभ्यो भगवत्परिजनपरिचरप्रभृतिभ्यो नमः इस मन्त्र से श्रीरामजी के सभी परिजन एवं

परिचरों की अर्घ्यादि से पूजन करे पूर्वोक्त विधि से भक्तिभाव युक्त होकर सर्वेश

श्रीरमजी के सभी परिजन परिचरादि की अर्घ्य आदि से पूजन करे ततस्तथैव भगवतः पूर्वे 3 ऋक्षराजाय नमः अ०। नीलाय नमः अ०। दक्षिणे सुग्रीवाय नमः अ०। नलाय नमः अ०। पश्चिमे शत्रुघ्नाय नम:

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१६६ गङ्गासहितः स्त त्त ्््््््््््््््््_>->>>2>३३ >> अ०। 3७ अंगदाय नमः अ०। उत्तरे ३७ भरताय नमः अ०। ३० विभीषणाय नम,

अ०। भगवतोण्ग्रे, 3७) आञ्जनेनाय महाबलाय हुं हनुमते नमः अ०। भगवत: पृष्ठ ३% लक्ष्मणाय , नमः अ०। सर्वेभ्यो भगवद्‌ द्वारपालेभ्यो नमः ' अ०।-इति भगवतो | द्वारपालानर्घ्यादिभिरभ्यर्चेत्‌'। ` |. '?। | पूर्वोक्तः क्रम से परिजनादि की पूजा के! वाद उसी प्रकार से-:भगवान्‌ के दवारपालों: को पूर्वादि क्रम से पूजा,करे ऋक्षराजाय नम:-इस मन्त्र को-बोलकर भगवदपेक्षया पूर्व दिशा में अर्घ्यादि से-श्रीऋक्षरजंजी “की पूजा कर तथेव।ॐ नीलाय नमः इस मन्त्राको बोलकर अर्घ्यादि मे :श्रीनीलजी ककी पूजा करे पुन: 3% सुग्रीवाय नमः इस मन्त्रको बोलकर दक्षिण: द्विशा में; अर्घ्यादि से -श्रीसुग्रीवजी की पूजा;करके 3७ नलाय नमः इस मन्त्राको “बोलकर/अर्ध्यादि:से श्रीनलजी :की पूजाः करें फ़िर ३» शत्रुघ्नाय नमः इस मन्त्र: को/बोलकर पश्चिम भाग में अर्घ्यादि से. श्रीशत्रुघ्नजी की पूजा कर 3७ अंगदाय नमः इस मंत्र को बोलकर-अर्ध्यादि:से श्रीअंगदजी की पूजा करे | पुनः 3%भरताय नम; इस मत्र को बोलकर।उत्तर दिशा:में 'श्रीभरतजी कीःअर्घ्यादिःसे पूजा।कर व्रिभीषणाय नमः-इस;मन्त्राको।बोलकर -अर्ध्याद्रिऽसे श्रीविभीषणजीः की पूजा करे अन्तर भगवान्‌ के आगे आञ्जनेयाय ;महांबलाय हुं हनुमते :त्तम: ;इस मनत्राःकीं> बोलकरः अर्ध्यादि से 5श्रीहनुमानजी | की | पूजा: कें व्राद श्रीरामजी के पीछे ।327लं लक्ष्मणाय नम:इस। प्मन्त्रःको बोलकर"अर्घ्यादि से श्रीलक्ष्मणजी कीः पूजा करे ।७३-सर्वेभ्यो। भगवद्‌, द्वारपालभ्यो नम: इस। मन्त्रःको बोलकर भंगवांन[-के-सभी द्वारपालों: को"अर्घ्य़ादिः से*पूजा करे ॥८ए जार ति ना 'तततस्तथैव (3०:श्रीविघ्नेशाय नमः? :अ०॥२अ५:श्रीबाण्ये “नम: :अ० 3 श्रीदुर्गायैःनम:]:अ०।:5%श्रीक्षेत्रपालाय नमः: अ०। ३% श्रीसूर्याय,नमः अ०॥ श्रीचन्द्राय नम: ।अ०।;३%। श्रीनारायणांयःज्मः!अ०। ॐ#श्रीनरसिंहाय।लम्‌ऽ-अशोः ३% श्रीवासुदेबायः नमः अ०॥॥३%: श्रीवराहायं ्ञेमःअ०।।:३ॐ5 श्रीइत्यड्ठदेवांनू सम्पूज्यःॐ 'श्रीसीतायैं- नमः अ०।।३ॐ श्रीलक्ष्मणायःजम्ः।अ०॥¡3-श्रीहत्रुमते नमं: अश; ३% श्रीभरतायाः नमः अ०। ॐ; 7श्रीशत्रुघ्नायः नमः अ०।-३# श्रीविभीषणायःनम:-अ०। श्रीसुग्रीवायःनम;;अ०।: ॐ-श्रीअंगादायःनमं:अ9। 3श्रीजाम्बब्ते[नम:: अ०. ३७श्रीप्रणवाय<नमे; अनाइत्यङ्गमर्खान्‌रप्रपूजयेत्‌ "गर प्पूर्बोक्तएक्रस से(क्वारपालादिकोंश्की।पूज़ा -के वाद्रः निम्न प्रकाराएसेः भगरवान्‌एक्रे

BF

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श्रीगमार्चनपद्धति: ३९ १६७

नड्डा <<< << दश अंग देवताओं को पूजे 3 श्रीविध्लेशाय नमः।इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यादि से विघ्नेशजी 'को पूजा करे।ॐ%'श्रीबराण्यैः नम: इस मन्त्र को बोलकर वाणी “की अर्घ्यादि से पूजे श्रीदुर्गायै नमः इस मन्त्र को बोलकर दुर्गाजी की.अर्घ्यादि से पूजे श्रीक्षेत्रपालाय नमः इस मन्त्र से अर्ध्यादि द्वारा क्षेत्रपालों की पूजा करे श्रीसूर्याय नमः इस मन्त्र सो सूर्य की अर्घ्यादि से पूजाः करे।। 32 श्रीचन्द्राय नमः इस मनत्र'से चन्द्र की 'अर्घ्यादि से पूजा करे'। श्रीनारायणाय नमः इस मन्त्र को बोलकर श्रीनारायणजी की! अर्ध्यादि से पूजा करे ।|3& 'श्रीनरसिंहाय नमः इस मन्त्र से अर्घ्यादि द्वारा श्रीनरसिंहजी की पूजा करे | 'श्रीवासुदेवाय नमः इस मन्त्र से श्रीवासुदेवजी की/अर्घ्यादि से पूजा करे ।३४& श्रीवराहाय नमः इस मन्त्र से अर्घ्यादि के द्वार 'बराहजी की पूजा करे इसप्रकार अंग देवताओं की :प्रूजा/कंरने बांद श्रीरामजी के अंग मनो की निम्न रूपसे पूजा करे श्रीसीतायै नमेः इस मन्त्र को बोलकर श्रीसीताजी की अर्घ्यादि सभी सामग्री से पूजा करे | तथैव ३७ श्रीलक्ष्मणाय नमः इस मन्त्रःसे“श्रीलक्ष्मणजीः की -अर्घ्यादि। से: पूजाः करेंका3£& श्रीहनुमते नमः इस मन्त्र से अर्घ्यादि के द्वारा श्रीहनुमातजी “की पूजाः करे 3 श्रीभरताय नमः इस मन्त्र से श्रीभरतजी की अर्ध्यादिःसे|पूजा “करे 3% श्रीशत्रुष्लाय नमः इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्यादि सेः श्रीशत्रुषघ्लजी की “पूजा करे।॥ए श्रीविभीषणाय नमः इस मनत्रःसेः अर्ध्यादि के द्वारा/श्रीविभीषणजी की पूजा! करे ३७ श्रीसुंग्रीवाय नमः इस मंत्र पके: द्वारा /अर्ध्यादि से श्ीसुग्रीवजी की पूजा करे श्रीअंगदाय नम: इस मन्त्र से श्रीअंगदजी-की' अर्घ्यादिःसे'पूजा'करे ३2 श्रीजाम्बवते नम: इस मन्त्र से| श्रीजाम्बवन्तजीः की। अर्घ्यादि से पूजाः करेके। ०३» प्रणवाय नमः इस मन्त्र से प्रणव की अर्घ्यादि से अच्छी 'तरहा प्रेमभावना-युक्त होकर पूजा करें | कागार “अड्भानू विना रामो विघ्नकरो भवति” ऐसा श्रीराम्रोप्रनिंषद्‌।में? लिखाए है अत: सर्वेश्वर श्रीरामजी के पूर्वोक्त विघ्नेश आदि दशअंग देवंताःतथांणश्रीसीताजीःआदि दश अंग मॅत्रोःकी पूजा सावंधानी "से सभक्तिभाव!करना चाहिये इसी ओर आचार्य श्री ने संकेत-प्रपूजयेत्‌!लिखकर किया है: क्योंकि सांग पूजा के। विना"पूजा सफल नहीं होती हैंगमक प्रकगामर-गाणए उक्ता& एणा कागा& एक ।कारि प्रात्री "5 डु संवेभ्यो' भगवद्‌ गणाधिपेभ्योऽनमः" अगे अःसर्वेभ्यो भंगवत्पार्ष

पीप BIR!

निशणीर $ एकाग्र क॑ शिा€ एिन्मणृः

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१६८ गङ्गासहितः

देभ्यो नमः अ०। सर्वेभ्यो भगवत्परिजनपरिचरेभ्यो नमः अ०। नीत्यै नमः अ०। मुक्त्यै नमः अ०। साङ्गसायुधसपरिवारसद्वीषीकायदिव्यमङ्गलमूर्तये नमः अ०। : पूर्व वणित क्रम से सर्वेश्वर श्रीरामजी के अंगों की पूजा करने के वाद पूर्वोदित् क्रम से ही सर्वेभ्यो भगवद्‌ गणाधिपेभ्यो नमः इसे बोलकर भगवान्‌ के सभी गणाधिपों को अर्घ्यादि से पूजा करके ३% सर्वेभ्यो भगवत्परिजनेभ्यो नम: इस मन्त्र से भगवान्‌ के सभी परिजनों को अर्घ्यादि से पूजा करे तब ३» नीत्यै नम: इस मन्त्र से नीति की अर्घ्यादि से पूजा करे ३% मुक्त्यै नमः इस मन्त्र से अर्घ्यादि से मुक्ति की पूजा करे अनन्तर साङ्गसायुधसपरिवारसह्विषीकाय दिव्यमङ्गल मूर्तये नमः इस मन्त्र से भगवान्‌ के अंगों आयुधों परिवारों परिकरों आदि तथा सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के साथ दिव्य मङ्गल विग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की अर्घ्यादि उपचारं से पूजा करे अथेत्थं पूर्वोक्तैः सह भगवन्तं श्रीराममभ्यर्च्य अञ्जलिनापुष्पाण्यादाय- अनन्तर पूर्वोक्त विधि से सर्वेश श्रीरामचन्द्रजी की अंग आयुध परिवार परिकर तथा श्रीसीताजी के साथ पूजा करने के वाद अज्ञलि में पुष्पों को लेकर निम्न श्लोकों से प्रार्थनाकर श्रीचरणारविन्द में पुष्पाञ्जलि समर्पण करे- सुरासुरेन्द्रादिमनोमधुव्रतैनिषेव्यमाणाङ्घ्रिसरोरुह प्रभो असंख्यकल्याणगुणामृतोदधे ? सुरेश ? रामाद्भूतवीर्यमापते ॥९॥ समस्त सुरासुर देव दानव इन्द्र प्रमुखों के मनरूपी भ्रमरों से सर्वदा सं सेव्यमान चरणरूपी कमलवाले सर्वसमर्थ हे प्रभु श्रीरामजी ? हे देवेश ? अत्यन्त अद्भूत लोकोत्तर चमत्कारी पराक्रमशाली सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी > असंख्य अनन्त कल्याण गुणरूपी अमृत के महासमुद्ररूप हे श्रीरामजी ? आपके चरणों में अनेक वार सादर दण्डवत्‌ प्रणाम है ॥१॥ अपारसंसारमहार्णवप्लवं पदाम्बुजं तं | लिए सुदृढ नौका रूप आपके शरण | मे कपी महासमुद्र को पार सर्वगदःखो. को-सवदा के लिए'नाश आकर प्रणाम-नमस्कार करनेवाले जनों के करनेवाले तथा अपने समस्त गण परिजन और

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श्रीरामार्चनपद्धति: १६९

परिकरो के साथ श्रीशिवजी श्रीविष्णजी और प्राय श्रीविष्णुजी और श्रीब्रह्माजी के द्वारा सर्वदा संसेव्यमान यानी निरन्तर सेवित शरण्य अर्थात्‌ सवां के लिए शरण में आने योग्य या शरण में आये जीवों को सर्वदा के लिये अभय करदेनेवाले उन प्रसिद्ध तीनों लोकों को पवित्र करनेवाले सर्वसमर्थ आपके श्रीचरणरूपी कमलों के शरण में आया हूँ प्रभो ? संसार भय से त्रस्त मेरी रक्षा करें ॥२॥ विकचपदादलायतलोचनां प्रणतकामदुघाङ्घ्रिसरोरु हाम्‌ अशरण: शरणं जनकात्मजे प्रतिदिनं भवतीमनुचिन्तये ॥३॥ अच्छी तरह से विकशित खीले हुये कमल पत्र के समान विशाल तथा अति मनोहर नेत्र वाली तथा आपके शरण में आकर प्रणाम करने वाले जनों के सव कामनाओं को पूर्ण करनेवाले चरणरूपी कमलवाली और अशरण यानी अन्य रक्षक या आधार से रहित जीवों को सर्वदा शरण प्रदान करनेवाली हे जनकनन्दिनी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी ? सवों को अभय करनेवाली आपको मैं प्रतिदिन सादर चिन्तन यानी स्मरण के साथ नमन करता हूँ ॥३॥ मणीन्दुगर्भ मुकुटाधिनाथं श्रीमत्किरीटं मणिकुण्डले श्रीकौस्तुभादिनि दिव्यभूषणान्येतानि नित्यं प्रणमामि विष्णोः ॥४॥ मणिरूपी चन्द्रमा है गर्भ-बीच भाग में जिसके ऐसे मुकुटे में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के मुकुट सम्पूर्ण शोभा से युक्त श्रीरामजी का किरीट तथा मणियों से शोभित दिव्य कुण्डल और दिव्य श्रीकौस्तुभमणि आदि समस्त दिव्य आभूषणों को सर्वदा प्रणाम करता हूँ ॥४॥ ्रतयूहव्यूहभङ्गं विदधदुरुबलशक्तिमान्सर्वकरी , भूरिश्रेयः प्रतापोमुनिवरनिकरेः स्तुयमानो विमानः रक्षोदैत्यादिनाशी क्षुभितजलनिधिरलोकजिल्लोकमान्यो

धन्योनोमङ्गलौघंसपदिसुकुरु ताद्रामशस्त्रासङ्घ 7; ॥५॥ अति वेगवाला तथा महा सामर्थ्य से युक्त अघटित घटना आदि सव कुछ करने में सर्वदा समर्थ और अत्यन्त श्रेष्ठ तथा प्रतापी तथैव सर्वदा अभिमान से रहित और राक्षस तथा दैत्यादि समूहों का नाश करनेवाला सर्वदा मननशील मुनिओं से अहनिश संस्तुत तथा अति अगाध समुद्र को अपने अलौकिक तेज से क्षुभित करनेवाला और सर्वलोकों को जितने वाला एवं सर्वलोक संमान्य तथा अति धन्य यानी सर्वविजयादि २२

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/ १७० गङ्गासहितः

स्स्स य्य २३ ऐश्वर्य सम्पन्न सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी का अस्त्र तथा शस्त्र (जिसको मन्त्र के विना चलाया जाता है उसे शस्त्र कहा जाता है जैसा बाण खडूग आदि मन्त्र प्रयोग पूर्वक जिसका प्रयोग किया जाता है उसे अस्त्र कहते हैं जैसे ब्रह्मास्त्र आग्नेयास्त्र आदि) समूह है वह अति शीघ्र ही मेरे विघ्न समूहों का विनाश करता हुआ समस्त मङ्गल सम्पादन करे ॥५॥ श्रीरामकैङ्कर्यपरायणम्मुर्हुमुहुश्च सीतेशनिदेशकारिणम्‌ तमेकवीरं शरदिन्दुकीतिं नमाम्यहं लक्ष्मणमप्रमेयम्‌ ॥६॥ सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के कैङ्कर्य सेवा में सर्वदा तत्पर तथा बारम्बार किसी भी प्रकार के सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञाओं को परिपालन करनेवाले शरदकालिन चन्द्रमा के समान स्वच्छ कीर्तिवाले अनन्य वीर अतिपराक्रमि शूर वीर बल तथा शोर्यादि में अन्य उपमा रहित उन प्रसिद्ध वीर श्रीलक्ष्मणजी को में नमस्कार करता हूँ ॥६॥ महाबलं वायुसुतं महामतिं प्रत्तचामीकरचारलोचनम्‌ श्रीरामपादाब्जनिविष्टमानसं द्विडन्तकं. श्रीहनुमन्तमीडे ॥७॥ सन्तप्त अति तपाये हुये सोने के समान अति सुन्दर नेत्रवाले अति बलशाली और महाबुद्धिशाली तथा श्रीरामचन्द्रजी के चरणरूपी कमलों में सर्वदा सन्निवेषित मनवाले और उपासक के शत्रुओं का नाश करनेवाले वायुदेव के पुत्र सर्वैश्वर्य सम्पन्न श्रीहनुमानजी को प्रर्थना यानी स्तुति करता हूँ ॥७॥ सुग्रीवमुख्यान्‌परितोचनान्प्रभोः सद्वरपालान्नलनीलमुख्यान्‌ गणाधिपान्देववरस्यविष्णोर्नमाम्यहं नित्यमशेषपार्षदान्‌ ॥८॥ सर्व व्यापक तथा देवश्रेष्ठ सर्व नियमन शील श्रीरामचन्द्रजी के श्रीसुग्रीव प्रभृति सर्वदा सान्निध्य प्राप्त परिजन तथा सभी द्वारपालों के साथ श्रीनलनील प्रमुख द्वारपालों और समस्त गणाधिपतिओं के साथ श्रीरामचन्द्रजी के नित्य पार्षदों को मैं नित्य ही नमन सादर प्रणाम करता हूँ ॥८॥ हरिः 3 यज्ञेन यज्ञमयजन्तदेवास्तानि धर्मानि प्रथमान्यासन्‌ तेहनाकम्महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवा: ॥९॥ सिद्ध संकल्प देवों ने यज्ञ से यानी याग के साधन रूप संकल्प से अथवा पूर्वोक्त सामग्री से यज्ञ को अर्थात्‌ सर्वत्र व्यापक रूपसे स्थित श्रीरामरूप विष्णु को

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श्रीरामार्चनपद्धति: „` १७१

~ “यज्ञो वै विष्णुः इस श्रुति से और ''यज्ञोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌” “सर्व विष्णुमयं जगत्‌” इत्यादि स्मृतियों से उस यज्ञ में पूजित किया उन लोगों से आचरित देवारधनादिक ही अन्य धर्मों के अपेक्षा श्रेष्ठ सनातन श्रीवैष्णवधर्म के रूपमें प्रचलित हुये जो आज भी विश्व का सर्व श्रेष्ठ धर्म के रूपमें मानव को मार्ग बता रहा है। वे पूर्वोक्त रीति से यजन करनेवाले परमपद श्रीसाकेत लाभात्मक नाक सर्व पापरहित श्रीअयोध्याजी को निश्चय रूपसे प्राप्त किये हैं जिस दिव्य धाम में प्राचीन साध्य आदि देवलोग अर्थात्‌ नित्यमुक्त श्रीहनुमानजी आदि नित्यपार्षद विराजमान हैं ॥९॥ जगत्पतेः ? श्रीश ? जगन्निवास ? प्रभो ? जगत्कारण ? रामचन्द्र ? नमोनमः कारुणिकाय तुभ्यं पादाब्जयुग्मेतवभक्तिरस्तु ॥१०॥

हे जगत्पति श्रीसीतानाथ ? हे जगन्निवास ? हे सर्वजगत्कारण भगवान्‌ श्रीराम ? हे दया सागर श्रीराम ? आपके चरणों में मेर शतशः नमस्कार हो तथा आपके पादपद्म युग्म में सदा मेरी भक्ति बनी रहे ॥१०॥ मनोमिलिन्दस्तवपादपंकजे रमाचिते संरमतां भवे-भवे यशः श्रुतौ ते मम कर्णयुग्मकं त्वद्भक्तसंगोऽस्तु सदा मम प्रभो ? ॥११॥

हे भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी ? मेरा अन्तःकरण रूप भ्रमर मधुपान कर्ता जन्तु विशेष सकल शौभाग्यवती श्रीसीताजी से समादृत आपके पद युगल में सर्वदा रमित होता रहे तथा मेरे दोनों कर्णेन्द्रिय आपके यश कीति को सुनने में संलग्न रहे और आपके जो अनन्य भक्त हैं उनके साथ हमारा सत्संग होता रहे अर्थात्‌ में भक्तों के साथ ही वार्तालाप करता रहूँ ॥११॥ इत्यभिष्टुबन्‌ पुष्पाञ्जलि सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रपदारविन्दे समर्प्य->

इसप्रकार से श्रीरामजी की प्रार्थना करते हुये पुष्पाञ्जलि सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के श्रीचरण कमलों में समर्पण करके- | उरः शिरोदृष्टिमनोवचः पदद्वयप्रराजत्करयुग्मजानुभि:

कङ्गैः क्षितौ तं प्रणमेदथाष्टभिर्दीर्घ तथैते कृतधीश्च दण्डवत्‌

इतिसाष्टाड्रदण्डवत्‌ प्रणामं कुर्यात्‌

पूर्वोक्त क्रम से भगवान्‌ की प्रार्थना करने के वाद प्रणाम करने का प्रकार-नियम बतलाने के लिए आचार्य श्री कहते हैं उरः इति सर्वेश्वर परमकारण रूपसे स्थित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम करने के लिए निश्चित बुद्धिवाले महापुरुष मन वचन दोनों पैर

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१७२ गङ्गासहितः

दोनों जानु घुटना छाती शिर मस्तक नेत्रयुग तथा फैलाया हुआ दोनों वांह-हाथ इन आठ | प्रकार के अंगों से पृथिवी में दण्ड की तरह लेटकर-गिरकर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी को... सभी भक्त लोग सादर दण्डवत्‌ प्रणाम करे इसप्रकार सर्वेश्वर श्रीरामजी को साष्टाङ्ग दण्डवत्‌ प्रणाम करे अनन्तर राजभोगादि के लिए निम्न प्रकार से व्यवस्था करे।

अथ महानैवेद्य समये पात्राणि प्रक्षाल्य पूर्ववत्पूर्णकुम्भजलेन पात्राणि पूरयित्वा भोज्याशनार्थ पादुके प्रसार्यार्ध्यादिभिरभ्यर्च्य मधुपर्क प्रदाय भगवत: श्रीरामचन्द्रस्य पुरस्ताच्छुचिप्रदेशे यथाशक्तिसम्पादितं चतुविधं भोज्यादीन्युपहत्य- |

पूर्वोक्त विधान से पूजा प्रणामादि के अनन्तर राजभोग के समय में पूजा पात्रों को प्रक्षालन कर पूर्व के समान ही पूर्णकुम्भ के जल से पात्रों को भरकर भोजन करने जाने के लिए पादुका को आगे करके पूर्व प्रदर्शित विधान से पाद्य अर्घ्य आचमनीय आदि से पूजाकर मधुपर्क समर्पण करें अनन्तर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के समक्ष अति पवित्र किये गये स्थान में यथा विधि यथा शक्ति सम्पादित चतुविध चार प्रकार के लेह्य पेय चर्व्य चोस्य एवं भोज्य विशुद्ध सामग्री को अति आदर के साथ रखकर निम्न प्रकार से प्रार्थना करें-> दोषाकरं नीचमथाल्पशक्तिं चैतन्यहीनं त्वशुचि त्वनर्हम्‌

त्वद्भूत्यकर्मण्यपराधभाजनम्परं दुरात्मानमितीत्थमेत ॥१॥ सुचिन्तयन्मामपि मत्समपितमशेषपापापहनामधेय ? उपेक्षितं त्वच्चरणावलम्विनं चार्हसि त्त : दाशराघव ? ॥२॥

शरणागत जीवों के सम्पूर्ण पापों के नाश कः .। प्रसिद्ध “पतित पावन सीताराम ''ऐसेनामसे जगविख्यात श्रीरामजी ? आदर के साथ पवित्रतया मेरे द्वारा कत वाकी दोषों का भण्डार नीच वृत्तिवाला और अयोग्य सव जन कल्याणकारी आपके उद्देश्य से हे हरे अतत दा से यन ही अंत अल करने से अपराध के पात्र बने

यु न्य अनन्त अवगुणों से लिप्त है ऐसा विचार कर हे

जगदीश्वर सर्वेश्वर श्रीराधवजी ? आपके दिव्य चरणों के करें ॥१/२॥ en |

कोशल्याजनकात्मजावरगुणश्रीलक्ष्मणैरपितं | पंपायां शवरीसर्पितमहो दव्याद्ुतस्वादकम्‌ |

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श्रीरामार्चनपद्धतिः १७२

भारद्वाजसमपितं सरसं क्षीरं व्रजे यत्स्वयं यद्धैयङ्गवमजितं सहघृतं यद्यज्ञपत्यपितम्‌ ॥३॥ अन्वैर्मुक्तजनैः कुचैलविदुराषद्यैरपितं त्वत्प्रियं पथ्यं पाकविशेषसंयुतमथो दृष्टिप्रियं राघव ? रुच्यं दोषविवजितं सह यथाऽशेषः प्रभो ? भोक्तृभिः स्वीकर्तुश्च तथार्हसि त्वमधुना भक्त्यार्पितं ते मया ॥४॥ हे राघव ? रघुकुल शिरोमणि श्रीरामजी ? आपने श्रीकौशल्याजी श्रीजनक नन्दिनी श्रीसीताजी सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त श्रीलक्ष्मणजी से सादर सस्रे समपित नैवेद्यादि तथा पंपा में शवरी द्वारा सस्नेह समपित लोकोत्तर दिव्य अद्भूत स्वादवाले फलादि तथैव श्रीभरद्वाज मुनिजी से सादर समर्पित अति रस वाले फलादि तथा सही व्रजवासी जनों से समर्पित सुस्वादु दूध वह अद्भूत स्वाद वाला ताजा नवनीत-मख्खन और उन स्नेही यज्ञ पत्नीयों से सादर समर्पित ताजे घी से सम्पृक्त विविध भोज्य पदार्थ तथैव अन्य अनेक मुक्तजनों और साधारण स्थिति में रह रहे श्रीविदुरजी तथा उनको धर्मपत्नी से सस्नेह समर्पित आपको अतिप्रिय अनेक प्रकार के पाक से युक्त नाना प्रकार के वानगी जो पथ्य तथा देखने में अति सुहावने थे तथैव रूचिकर और सव प्रकार के दोषों से रहित थे उन सवां को आपने अपने समस्त सेवकों दिव्य पार्षदों के साथ जैसे सस्नेह स्वीकार किया प्रभो ? सर्व समर्थ श्रीरामचन्द्रजी ? आज मेरे द्वारा आपको भक्ति पूर्वक सादर समपित इन भोज्य नैवेद्यादि को भी उसी प्रकार स्वीकार कर इस अबोध आपके शरणापन्न बालक को कृतार्थ करें ॥३-४॥ हरिः नाभ्याऽआसीदन्तरिक्ष शीष्णोद्यौ: समवर्तत पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां२ ऽअकल्पयन्‌ ॥५॥ इस प्रकार विनम्र भाव से प्रार्थना कर पुनः सर्वकारणभूत सर्वेश्वर आपके ही नाभी से अन्तरिक्ष आकाश उत्पन्न हुआ तथा शिर से द्यौ लोक तथा भूमि पावों चरणों से और दिशायें कान से उत्पन्न हुये हैं यानी पूर्वोक्त क्रम से ही विश्वरूप आप से ही आकाशादि सभी लोक स्थावर जंगमादिक सव प्रपञ्च उत्पन्न हुआ है अत: विश्वरूप आपको आपको ही सामग्री सादर समर्पण कर रहा हूँ उन्हें स्वीकार करें इति विज्ञाप्यार््वजलेन प्रोक्ष्य श्रीमन््रराजेनाभिमन््य सुरभिमुद्रां प्रदर्श्य श्रीरामं जनकात्मजामनिलजमित्यादिगुस्परम्परामनुसन्धाय निवेदयेत्‌

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गङ्गासहितः

१७४ “स्स्स >>> इस प्रकार नैवेद्यों को स्वीकार करने के लिए सादर निवेदन कर अर्घ्य जल से प्रोक्षण कर अनन्तर षडक्षर श्रीमन्त्ररज से अभिमन्त्रित कर सुरभि मुद्रा दिखाकर श्रीरमजी से लेकर अपने आचार्य पर्यन्त के गुरु परम्परा का स्मरण कर नेवेद्य निवेदन

करे

ततो जलपानहस्तशोधनगण्डूषपाद्याचमनादिभिरभ्यर्च्य-> अनन्तर सर्वेश श्रीरामजी को जलपान कराना हाथ प्रक्षालन गण्डूष कराना ओर

आचमन कराना तथा श्रीचरण प्रक्षालन आदि प्रभृतियों से पूजा करके-> श्रृणोमि सीतापतिचित्रसत्कथां वदमि सीतापतिकीतिमक्षयाम्‌ स्मरामि सीतापतिदिव्यविग्रहं वृणोमि सीतापतिभक्तिमुत्तमाम्‌ ॥१॥

मैं अन्य लौकिक विषयों से विरत होकर सर्वेश्वर श्रीसीतापति श्रीरामजी की सव वेदों से अतिअद्भूत रूपसे वर्णित भवपाश नाशक कथा को सर्वदा सुनाता हूँ तथा श्रीसीतापति की ही अक्षय कीति श्रीरामजी के दिव्य कथा प्रसङ्गो को सर्वदा गान करता हूँ तथैव श्रीमीतानाथ श्रीरामचन्द्रजी के दिव्य सर्वलोकोत्तर सुन्दर श्रीविग्रह का सर्वदा स्मरण करता हूँ और सर्वजन शरण्य श्रीसीतापति श्रीरामजी की सर्वोत्कृष्ट भक्ति को ही वरण यानी स्वीकार करता हूँ जो सर्वजनों को सायुज्य मुक्तिदायक है अन्य की भक्ति नहीं क्योंकि अन्य देव सर्वदा के लिये सव जीवों को सव जीवों या दुःखों से अभय प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं ॥१॥ ब्रजामि सीतापतिदिव्यमन्दिरं तथा सीतापतिसत्प्रपन्नताम्‌

युनज्मि सीतापतिचिन्तनेमनः तनोमि सीतापतिदासङ्गतिम्‌ ॥२॥

मैं अन्य विषयोन्मुखता को छोडकर सर्वदा श्रीसीतापति श्रीरामजी के दिव्य मन्दिर के तरफ ही जाता हूँ तथा मनुष्य देह की सफलता के लिये श्रीसीतापतिजी को शरणागति को सर्वतोभाव से स्वीकार करता हूँ तथैव श्रीसीतापतिजी के चिन्तन में मन को सदा लगाये रखता हूँ और श्रीसीतापतिजी के दास अनन्य सेवक सव भक्तों के साथ संगति को अधिक से अधिक बढाया करता हूँ यानी श्रीरामजी के दासों की संगति सदा किया करता हूँ अन्यां की नहीं ॥२॥ अवैमि सीतापतिमञ्जुबन्धुतां तथा सीतापतिदिष्टभोग्यताम्‌

दृढबन्धुता को स्वीकार करता हूँ अथवा " |

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श्रीरामार्चनपद्धतिः

आम / १७५ श्रीसीतानाथजी ही भर एक मात्र अनन्य बन्धु हैं इस बात को मैं अवगम करता हूँ। तथा श्रीसीतानाथजी के द्वारा निदिष्ट भोग्य पदार्थ को ही भोगता हूँ यानी मेरे कर्मानुसार मेरे लिये भोग्यतया समुपस्थित पदार्थों को श्रीराम शेष बुद्धि से यथायोग्य उपभोग करता हूँ तथैव श्रीसीतापतिजी के नित्यधाम श्रीसाकेत को देनेवाली श्रीसीताजी श्रीरामजी की सर्वोत्कृष्ट भक्ति-शरणागति-सर्वाभयप्रद प्रपन्नता को स्वीकार करता हूँ ॥३॥ करोमि सीतापतिपाददासतां नमामि सीतापतिपादपङ्कजम्‌ पठामि सीतापतिकाव्यसंहति जपामि सीतापतिमन्त्रभूपतिम्‌ ॥४॥ मैं अन्य सामान्य जनों की या देवों की दासता को छोडकर श्रीसीतापतिजी के श्रीचरणकमलों की दासता को स्वीकार करता हूँ. और श्रीसीतापतिजी के चरणकमलों को ही सर्वदा नमन सादर दण्डवत्‌ प्रणाम करता हूँ, तथैव श्रीसीतापतिजी के दिव्य गुणसम्पन्न काव्यसमूहों को ही सदा पाठ करता हूँ, और श्रीसीतापतिजी के महामन्त्र मन्त्रराज षडक्षर महामन्त्र को ही एक चित्ततया सदा जपता हूँ, अन्य मन्त्र का नहीं, क्योंकि अन्य मन्त्र चित्त में भ्रम पैदा करनेवाले हैं निश्चित रूपसे मोक्षदायक नहीं मोक्ष ही जीवात्मा का चरमलक्ष्य है अतः सायुज्य मुक्ति प्राप्ति के लिये सदा श्रीराम षडक्षर महामन्त्र को ही जपता हूँ ॥४॥ करोमि सीतापतिविग्रहार्चनं तथा सीतापतिमू्तिदर्शनम्‌ गुणाब्धिसीतापतिनामकीर्तनं परेशसरीतापतिपादवन्दनम्‌ ॥५॥ मैं सर्वदा श्रीसीतापतिजी के दिव्य श्रीविग्रह का पूजन किया करता हूँ, तथैव श्रीसीतापतिजी के सर्वमङ्गल कारक दिव्यमूति का दर्शन सर्वदा किया करता हूँ, और सर्वगुणों के सागर श्रीसीतापतिजी के सर्व अमङ्गलों को अपहरणकर जप करनेवालों को सव प्रकार के मङ्गलों का प्रदान करनेवाले दिव्य नामों का संकीर्तन रात दिन किया करता हूँ तथा सर्वेश्वर श्रीसीतापतिजी के लोक कल्याण कारक श्रीचरणकमलों की वन्दना सदा किया करता हूँ जिन श्रीचरण की धूली के स्पर्श मात्र. से अघरूपा गौतम नारी का उद्धार हुआ तथा जिनके चिन्तन से अनन्त पतितों का कल्याण हुआ उन पादपद्ों की सदा वन्दना करता हूँ ॥५॥ भजामि सीतापतिमेवकेवलं रटामि सीतापतिमेव केवलम्‌ श्रयामि सीतापतिमेव केवलं प्रयामि सीतापतिमेव केवलम्‌ ॥६॥

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१७६ गङ्गासहितः

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जज्ज कळकळ

मैं केवल श्रीसीतापतिजी का ही भजन यानी सेता करत! हूँ अन्यों का नही, तथैव श्रीसीतापतिजी के दिव्य नामों का ही रटा करता हूँ अन्य नामा का नहीं और सर्वाश्रय दाता श्रीसीतापतिजी का ही पप लेता हूँ अन्यों का नहीं, तथा सर्वशरण्य श्रीसीतापतिजी के तरफ ही जाता हूँ अन्या के तरफ नहीं जाता हूँ ॥६॥

इत्याद्यनन्यतावेदनस्तोत्रपुरु षसूक्तादिकं पठन्‌ प्रदक्षिणनमस्कारादिभि: संपूज्य भगवन्तं श्रीसीतासमेतं श्रीरामचन्द्रं प्रर्यङ्केनिवेश्य-

इत्यादि जगद्गुरु श्रीगद्भाधराचार्य प्रणीत अनन्यतावेदन दिव्य स्तोत्र तथा पुरुषसूक्त आदि को पढता हुआ श्रीरामजी की प्रदक्षिणा तथा नमस्कारादि से अच्छी तरह पूजा करके श्रीसीताजी के साथ भगवान्‌ श्रीरामजी को पर्यङ्क में सन्निवेश करके निम्न प्रकार से प्रार्थना करे- पर्यज्लसनमारुह्य सीतया सहित प्रभो ?

निद्रां कुरुस्व भगवन्‌ ? पार्षदैरभिरक्षितः ॥९॥

इति प्रार्थयन्‌ निम्नाष्टकं गायन्‌ शाययेत्‌

षडैश्वर्य परिपूर्ण सर्व समर्थ सर्वेश्वर श्रीरामजी ? स्वच्छ स्फटिक मन्निभपर्यंकासन दिव्य पलंग पर समारोहित होकर श्रीसीताजी के साथ श्रीहनुमदादि पार्षदों से अभिरक्षित होकर आराम करें यानी सुखनिद्रा का अनुभव करें

इसप्रकार से प्रार्थना करते हुये निम्न श्रीरमदोलिका शयानाष्टक का मधुर स्वर गान करता हुआ श्रीरामजी को सुलावे माता गीत्वा स्वपुत्रं यदि शयनगतं संविधत्तेऽथ शेषिन्‌ ?

शेत्रत्त्रा सात््यतत्वं गतवत इह मे कौशलाधीशजाया: वात्सल्यातुल्यपात्रं स्वपिहि गुणगणोदारगीतेन गीतो देहे सौधेऽतिशुद्धे भजनकलनतः स्वान्तदोलाऽधिशायी ॥१॥

पालना म॑ बालक मता का गीत सुनते-सुनते सो जाते हैं अथवा गीत गाकर माता बच्चे को सुलाती है ऐसा अनुभव है इसलिये समस्त जगत्‌ का प्रयोजन होने के कारण हे शोषिन्‌ में तथा श्रीकाशल्याजी दोनों का एक मात्र आपके अधिन होने Feed होने के कारण मेरे तथा श्रीकौशल्याजी के अनुपम दुलारे

कारण अत्यन्त धा में भाकल Rh प्रसादरूपी मेरे देह में मेरे गीत सुनते-सुनते सो जायें यानी

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श्रीरामार्चनपद्धतिः १७७ eo मेरे मन में स्थिररूप से वास करें ॥१॥ कौशल्या कीतिधन्या यदुद्रजनिमागाज्जगद्यत्तनुः

श्रीरामो रावणस्याऽप्युपवनशिरसां कर्तितैकेषुणाद्राक जामाता$न्वर्थनाम्नो नृपतिकुलमणेयों विदहस्य कुर्यात्‌ स्वापं दोलां श्रितो हन्‌ मम दशरशसूर्भक्तिगद्भाम्बुधौतम्‌ ॥२॥ वह कौशल्या अपनी कीति से धन्यवाद का पात्र हैं क्योंकि स्थूल सूक्ष्मचिद चिदात्मक यह संसार जिसका शरीर है, ऐसा श्रीरामजी ने जिसके उदर से अवतार- जन्म लिया था इससे बड़ी कीति और क्या हो सकती है वे श्रीरामजी जिन्होंने एक ही बाण से अत्यन्त लघुता से रावण के दश मस्तकों को काट दिया था तथा विदेह कहे जानेवाले राजाओं के कुल में श्रेष्ठ ऐसे विदेह के जो जामाता हैं ऐसे श्रीरामजी श्रीदशरथजी के पुत्र मेरे भक्तिरूपी गङ्गाजल से पवित्र ऐसे हृदयरूपी दोला पर रहनेवाले निद्रा को प्राप्त करें अर्थात्‌ भक्ति से भरे मनमें सदा वास करें ॥२॥ नीलाभो नीलापद्योद्भवकृतजगतीनाथ ? सीताधिनाथः सद्भिर्भाग्योऽपि भोग्यं ननु निखिलमिदं यस्य लीलाधृताङ्गः धन्वोन्मुक्तेषुणाऽव्जच्छदमिव सितवां स्ताटकोरः परेशो भक्तिक्षीराब्धिशेषं सदपि मम मनोदोलिकांसोऽधिशेताम्‌ ॥३॥ अपने नाभि कमल से उत्पन्न हुए ब्रह्माजी के द्वारा उत्पन्न किये गये जगत्‌ के स्वामी हे श्रीरामजी ? नीलकान्ति वाले तथा श्रीसीताजी के प्राणेश्वर आप सज्जनों के सेवनीय हैं पुनश्च यह सम्पूर्ण संसार आपकी लीला का विषय होने से आपका भोग्य है आपने ताडका की छाती को धनुष से दोडे गये बाण से कमल के पत्ते के सदूश सरलता से ही काटा था आप ही परमेश्वर हैं इसप्रकार जगत के कर्ता तथा पालक एवं दुष्ट का निग्रह करनेवाले आप भक्तिरूपी क्षीरसागर में शेषनागरूपी मेरे मनको दोला पर शीघ्र ही सो जायें ऐसी मेरी प्रार्थना है यानी आप शेष शैय्या के समान ही मेरे मन में सदा निवास करें ॥३॥ राज्यं दत्त्वाऽनुजायाऽतिविपुलविलसच्छ्रीसमिद्धं निरीहो वक्ष्यस्वीवीरलक्ष्मी वसतिरनुपमोदारकीतिनिरतिः अव्राजीलक्ष्मणेनाऽतिगहनविपिनं भक्तिभाजाऽनुजेना ऽऽशेतां दोलां वरेण्यो मम हृदयकृतां सज्जनानां शरण्यः ॥४॥

२३

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१७८ | ' गङ्गासहितः

विशाल छाती वाले तथा वीर के संभी' गुणों सें।युक्त श्रीशमजी मजी निष्काभ!हीने के कारण विशाल एवं समृ राज्य अपमेप्कोंटे। जाके श्रीकषत्तजी-की विकर अतुर्नक्व महान्‌ कीर्ति से शोभित तथा किसी? प्रकार! की पीर ःको मॅमःमै£नहीं रखते हुये छोटे भाई तथा परम भक्त ऐसे श्रीलक्ष्मणजी'के सांध उक्तकक्तानंक्हुर बिनारधिशाचेटके तना के रक्षके पुरुंषोतमा श्रीरमंजो“मेरे मिनभेचमाथे पालने मिं हीं स्का विचार करें ऐसी मेरी उनसे प्रार्थना है; ऐसे पुरुषोत्तमा!श्रीरामजी में ही भिराव्मकन्संदात्लगा रहे ॥४॥ साक्केतोशी 'विमातुर्वचनकरंवरे?ज्ञोनिनांमर्गरभूरमिः [कारी शाश? छाए काफाऊनी पौरेपित्रैस्सेथोन्यैरमुगर्मेनकीररदैण्डका साकमाप्त | मव शैषांणां तभ्मुंनींना 'परमहितकतेः दिव्यभैषज्यतुल्यी "75 7 णार छि EFS दोलया स्वापेमेयाष््रघुकुंलतिलंकोमानसे में "ख रागः मषिं रघुकेल के तिलक संमाने-साकेतषुरं के स्वामी! तथा ज्ञामियों काआलम्बिन स्वरूप तथा 'विमोता के आंज्ञाकोरियो में श्रेष्ठ होने के कोरा बिमाता की आज्ञाग्से दण्डक नामके वन में वहाँ“केपंरंक मिक्त मनियीः के्षर्माम्करल्याणाकीर्सांधर्क के लिए दिव्य ओषधे के तुल्या शेम श्रीरामजी' अनुगमिन काते :हुयेःनगर के मित्र तथा अन्य जनों के साथ ही पहुँचे थे” जसी अलौकिक प्रबनिकज्सेन्कमन्नज्तथास्जीप्रतिम भर्कर्वत्सले श्रीराष॑जी मेरे मंनरूँपी पालने में/शर्नःकरीओऔरतमैसः मन सर्वदा उनके “योर्मि मे ही आम रहे SF पर जम छि तक शीर ण& ' सुग्रीवायाउधिराज्य ददर्दभिनिर्वकी$र्ब्दच्छविर्घालिकालेी ` ॥ंनगाणीहे गगिछछ ` प्रशिवारेंप्यंपोरे केरैबैद्धसेर्तुक्षिभिय 5]! 5 गी

0 दोलां चेतोउधिशेता मम संकलकलोध्वस्बिनाग्रामंणीः सःजाइ॥

77 5 जोश्रीरमजी भवीन मेधे के'समोन कॉम्ताचाले हँ घनुर्घरौं मेंगजुख्कहें,प्जो वालि |

“के लिए यमराज समान हैं तथा सुग्रीव की पवशालरीज्य देमेबालें हैं तथा जिम्होंने'र्बतों के समूहों से अपार समुद्र में सेतु बाँधा था, तथा जिन्‍्होंनेशक्षणों सेस्स्रक्षितरोसी रविण की राजधानी लंका का नाश कियाय! घ्यीतनसालागेके जोग सिमी कलाओके युक्ताएवं सर्वत्र व्यापक ऐसे वे'प्रीशंजि/घेरीसकलपीजलमेंश्षे ज्षगनाकरेंसक्ष लोकाक्ष्या सेचनाढ्यातुलबलबुषो'्रा्िमाी विं न्छागीर]ानण

।। ४॥ :उण्प्राए

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ळा) नहत... नियीय अंकल “मिड... श्रीरमार्चनमद्धतिः gt कोदण्डेनेषुणा चोल्लसितकरकज: श्रील्िशालः पखुमाल न? तर छि कक FP In °। गणका हिले (सरापे. म्रेयाइहितत्रितिकृहोलिक्राग्रां सर 'जिनके-दर्शनोमें!लोगोंक्ते तित्राकरधी तृप्त तही शैत्तेः ऐसे तक्षातनुन' नन सेतरमुत्ताः शरीरवालेःतिरभिमाती-घिकसित नीला कमलः क्रे समानः इस्राम' वर्णा सेत नोहर -तरतुष तथा बाण से शोभित करकमलवाले. डाम मांलाःखने-्िभूधित सभी प्रकार के अतिशयों से युक्त दुष्टों के निग्रह करनेवाले) श्रीगरमज़ीःमेरे.चित्तः खी पालने में शयन कर ॥७॥ वीशणामप्रिणीर्य:०सुरदेतुजनृणांजजम्िन्ञा -वेतरेषां 55 एड गिजा गाए कर्तापाता5 थहततासमिरूत्रसुततोः हेयहीसो 5 पय्रहीत] ७-5? णि स्लुत्यो:ओम्पेश्चसम्यश्चिदचिदुभघव्याफ्विकात्िख्कमा र) उ]! फार आला रामी स्कपंऽमाएस्रा दसित्मणिततर्सलिक्रायां स[चित्ते १५६7 क॑ 'न्जोज्क्रीयम्ीन्रीरों क्रेऽअग्रसरु है तथा: जोन देक़्ा:दानत्राणिनुस्म्ठािि अन प्राणियों क्रः कर्ता रक्षक तिथ्ाःनाशाकरनेवाले भीः हैं सभी; प्रशस्तियों ' सेमल ` हेसमुणों क्रे० सास सेरी रिहितहिँ ताकी ज़ो।सहातर हैं; :स्थूलत कंस सूक्ष्मः जिल ;्रश्लार अचेतन को अपने शरीर में सम्रायेऱहुये हँ ॥उतभ्रासर्वेव्कृष्टाशतिनय़ जिसीममनतानअदि गुफा से”सप्पन्न-कै) इसलिवे केषर व्रल्हीमस्तुत्ति के प्रणा के थामाल क्रे योग्य हेंडऐसे मीलमणि के ससान: कानिति7सेः युक्त शग्रँरवाले- श्रीरामजी; मेरेऱममरूप्री लने

में शयन करें मेरा मन सदा ही ७उनमेंगलगाऱहे ॥४॥क्ीए एणूणाठ हालोलिछ प्रकालप्र

बोलकर श्रीविभीषमजी को नमः महा नैवेद्य पम

महाप्रसाद समुर्पणाक्रणे'के व्राबशानत महाप्रसाद का सेवन करें श्रीवैष्णवों को यूह,

जो कोई भोज,

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१८० गङ्गासहितः

समर्पित करके ही स्वयं सेवन करे एकाकी नहीं रामानन्दोपदिष्टेयं श्रीरामार्चनपद्धतिः मुमुक्षूणां मुदेभूयाच्छीरामप्रीतिकारिणी ।१। अर्चकोय:समभ्यचेंदास्थायेमामहर्दिवम्‌। प्रासाद्य सगणं रामं लभतेगतिमुत्तमाम्‌ इत्यानन्दभाष्यकारजगदगुरुश्रीरामानन्दाचार्यप्रणीतश्रीवैष्णवमताब्ज भास्करपरिशिष्ट ॥॥ श्रीरामर्चनपद्धतिः '४ श्रीरामः शरणं मम पा '“मड्ठलादिनी मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषा णि भवन्त्यायुष्पत्पुरुषाणि चाध्येतारश्च मड्भलयुक्ता: स्युः” इस स्मृति वचनानुसार आचार्य सम्राट्‌ जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी प्रबन्ध प्रकरणान्त में आशीर्वादात्मक मङ्गल वचन पूर्वक प्रकरणोपसंहार करते हैं-रामानन्द इत्यादि जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी से स्वशिष्य जगदगुरु श्रीसुरसुरानन्दाचार्यजी के “तत्वं किम्‌'' ? आदि दश प्रश्नों को निमित्त बनाकर सर्वलोकोपकारार्थ उपदिष्ट यह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के श्रीचरणों में अनन्य प्रीति करनेवाली श्रीरामार्चन पद्धति सव मुमुक्षुजनों के लिये सायुज्य मुक्ति प्राप्त कराने वाली हो ॥१॥ जो अर्चक श्रीरामजी की पूजा इस श्रीरामार्चनपद्धति के विधानानुसार सदा त्रिकाल अच्छी तरह से समाराधन करेगा वह श्रीरामजी के एवं गणों के साथ उन्हें प्रसन्नकर सर्वोत्तम सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करेगा ॥२॥ इसप्रकार यह आनन्दभाष्यकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यप्रणीत श्रीवैष्णव मताब्जभास्कर का परिशिष्टभाग पूरकभाग श्रीरामार्चनपद्धति की जगद्गुरु श्रीरामानन्दा चार्य श्रीरामप्रपन्नाचार्य योगीन्द्र शिष्य आनन्दभाष्यसिहासनासीन जगद्गुरु श्रीरामानन्दा चार्यश्रीरामेश्वरानन्दाचार्यप्रणीत गङ्गा टीका पूर्ण हुई पा श्रीराम: शरणं मम फा श्रावणशुक्लसप्तमी २०४२

आचार्यस्तुतिचन्द्रिका

थी जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यश्रीरामप्रपन्नाचार्ययोगीन्द्रप्रणीता पर

सञ्जानन्ति सदाचारान्‌ सदाचारान्‌ वदन्त्यपि रामब्रह्मरतान्‌ ब्रहारतान्‌ तांस्तु स्वाचार्यान्‌ प्रणमाम्यहम्‌ ॥१॥

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श्रीआचार्यस्तुति चन्द्रिका १८१

000 सन्त का गुरुनिष्ठान्‌ तान्‌ गुरोराज्ञाकरान्‌ तथा गुरुपूजारतान्‌ तांस्तु स्वाचार्यान्‌ प्रणमाम्यहम्‌ ॥२॥ रामप्रपन्नयोगीन्द्रः सीतारामपरायणः प्रणमामि सदाऽचार्यान्‌ सदाचाराभिवृद्धये ॥३॥ सीताराम समारम्भां रामानन्दार्यमध्यमाम्‌ रघुवरार्य गुर्वन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम्‌ ॥४॥ सीता स्वयं हि सावित्री भवान्‌ ब्रह्मा चतुर्मुखः सीता रमा भवान्‌ विष्णुः सीता गौरी भवान्‌ शिवः ॥५॥ सीता भुक्ति भगवती भोक्ता त्वं पुरुषोत्तमः। सौतयं मुक्तिरचला मोक्ता त्वमकुतोभयः६ रमन्ते योगिनो यस्मिन्‌ राम त्वं ब्रह्म तत्परम्‌ त्वद्विभूतिरियं सीता विश्वाकारा हि दूश्यते ॥७॥ सत्यानन्दस्त्वमेबासि यत्र भेदो दृश्यते सीताराममहं वन्दे भक्तियोगसमन्वितम्‌ ॥८॥ दिव्यदेहगुणं रामं सच्चिदानन्दविग्रहम्‌ रामप्रपन्नयोगीन्द्रः प्रणमामि हृदि स्थितम्‌ ॥९॥ दिव्यदेहगुणां सीतां सच्चिदानन्दविग्रहाम्‌ रामप्रपन्नयोगीन्द्रः प्रणमामि हदि स्थिताम्‌ ॥१०॥ मैथिलीहृदयं रामप्रियं मारुतिनन्दनम्‌ अञ्जनीगर्भसम्भूतं हनुमन्तं महाबलम्‌ ॥११॥ भक्तकामेष्टदं वीरं सीताशोकविनाशकम्‌ रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥१२॥ ब्रह्माणं सृष्टिकर्तारं रामध्यानरतं सदा रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥१३॥ वशिष्ठ ब्रह्मतत्त्वज्ञं वेधसो मानसं सुतम्‌ रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥१४॥ पराशरं वशिष्ठस्य पौत्रं धर्मविदांवरम्‌ वा रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥१५॥ व्यासं द्वैपायनं ब्रह्म सूत्रकर्तारमच्युतम्‌ अष्टादशपुराणानां कर्तारं वादरायणम्‌-॥१६॥ वेदोपनिषदां तत्त्वविदं सत्यवतीसुतम्‌ MS रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य 'प्रणमाम्यहम्‌-॥९।७॥

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कज्नज्योमेकिप्रेणीत शि

व्यासपुत्रं शुकाचार्य मोहमायाविवर्जिर्ती गक कन्या हनन हु नपन rrr FTF FGFS" eB ;॥ एडाऽगाणाणमरप्षेषोती््दिप्रैणर्ममि जिगिर्दुशुरुम्‌ ॥९८॥ हीधार्धक्यासिक्कारमााधी 'पुधोरिधि्मीी | $F इनी मछालणाार ॥४॥ प्ाघएणा तः 5नजप्रेप्रपन्नयोगीस्टरः प्रणाभिः जंगद्शुरुमः ॥९३रर णामा राज्ञ गङ्गाधराचार्य शिष्यं बोधाथनहयें/ हुन जाए हिठीए डी छळ फा .॥। “नारी ]नाऊ प्कमफ्र्षन्नेयोमीर्द्रि: प्रणशार्मि/जंगगुरुम्‌ ॥२०॥ सहाभ हसन रभियजञप्रवर्धकम्‌ः। रॉमप्रपेन्रयोंगीक्र / स्वाचार्य प्रिणभाभ्यहम्‌१रश रामेश्वर वेदविदं बौद्धवादविखण5कंम्‌ माए कछीए गछ किए ॥९॥ 5 सँग प्रपक्यौगल्द्रि स्वा चथि प्रॅफफॉम्यहम्‌ ॥२२॥ | द्वारानन्दं यतिश्रेष्ठ तर्कशास्त्रे विचक्षणम्‌ fr F IP FB PIPED PTE | ] समेख्रचक्वयीर्गद्िः स्काचार्यग्रणम्ोप्यहम्‌ ॥२३॥ सीतारामस्य सद्धक्तं देवानन्दं महायतिम्‌ /गएगीक्रानक्राज्डीफ माए णुम्राखकी ?॥ मा्गीमंत्रवत्रचीणीम्छरः स्नाधर्यि तप्रमभाभ्यहम्‌ ॥२४॥ एयामानन्दं श्रुतौ श्रेष्ठ ्रुतितात्पर्यबोध्कङ्गे प्रः 7 ज्जा Int गणाग्डरणन्क्री ॥॥ गज मग्रिधन्रथीजीप्द्रिर स्वाचार्य "प्रणच्राच्यहम्‌ ॥२५॥ श्रुतानन्दं श्रुतौ दक्षं श्रौतसिद्धान्तकोविदम्‌। ।एफनकी ठार गरी फल्ङ्जीकाशीि 9 8॥ मप्रपत्रंयीगीररक्र स्त्रीची प्रणॉम्यहम्‌ ॥२६॥ सच्चिदानन्दतत्त्वज्ञं चिदानन्दं जगद्गुरम्‌ हेकाप्रान्ीर्ळाग्राजी5 गरी $छागिकतता£ ॥£ 8॥ माऱ्कमिफ्रिपत्नयीणीम्करः स्वाचार्या'्तातराध्यहम्‌ ॥२७॥ मर्क कषहामिए वहाकिशाप्रचास्किमहएएाः | फाउ छानाऊारा फक णाज़ह

रामप्रपन्नयोगीन्द्र:। संबात्रा कच्रलर्मच्यहम्‌ एरा छाएी5

व्यास

श्रियानन्दं य॑तिश्रिछे'शमसस्स्रः ह: शनीर्णालणरणाए | रामप्रपन्नयोगीन्द्र: स्वाचार्ची;प्रणोब्कभ्यंहम्‌ ॥हहा 5 ऽए | हर्यानन्दं मरहर्सि(६7च्यायझास्त्रविज्ञारह्क्‌ ।:इनीर्णाणलणएागाः

रामप्रपन्नयोगीन्द्र स्कचार्य ग्रणनाच्क्रहक्‌पर हणा फाएठ ब्रह्मषि राघवाम॑न्द/ थेद्वेशइकतरममं फ॒त उन

रामप्रपन्नयोगीन्द्र: संवाचा्च प्रनकाध्यंहमीमङर काणा

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जी क्षाज़ाप्रीज्ञुतिचन्द्रिका ३% तिक

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| 2% पज़्जणगाएणप़ानन्क्राष्कयं शाङ्नःामरा्व्ु्ोः महीतले ॥३२॥ खंनभोवेदवेदप्रमिते ( ४४०० ) वर्षे गतेः क्रलौ लान कं शुः ईलशिगा ` 9 १35 एधाधस्यकृष्रणसप्तषध्योमाचार्यष्टखमवातरत्‌ ॥३३॥ रसषिबाणवेदाब्दे ( ४५७६ ) मधुमासे कल्लैनशुष्षेछीलकतागः गानानि 35 5 खरी द्रार्नघथ्यां तवै सकेतसमधत्प्रभु: ॥३४॥ आनन्दभाष्यकारं तं रामानन्दं जगद्गुस॑म्‌णके एला छानिए हिलि ' "5 737 पमप्रपेषेयोगीनद्रः स्थाचीर्यस्प्रेणमाम्यहम्‌ ॥३५॥

रघुनाथसुतोजात:ः भवनाथेति विश्रुतः प्रकानञठीलकफाइई BTS

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निरस्तबोद्धमि्भएतं, श्वतगौतमविग्रहम तगौतमविग्रहूम गाणाफनः595 BTiS रू

भावाना; महामिद्वमप्रत्रिह्वेहीजतरकोप्रियतू:: राग ol प़डठाप्णागाणर गार नतय एश्रप्नायोप करर स्तराचा -प्रणप्राम्महप,॥॥३॥. 5,

विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तप्रतिपाद्ये चिदात्मनि ॥-४॥ः हनी जाजाड़ागनछ एच TERT एउाऽगाएभिीजासिमेनक्बा लीनो तत्मङ्गएतक्न्रदशिनम्‌ ॥४०॥ हुँ अनुभवार्यमाचार्य श्रुतिज्ञक्ष तपोनिक्षिष्‌र। कको) उंद्वाऊूफ ॥णाल्माएड्ाऊठफऊ़ठ

।3/0॥ गए निर्शेपप्रप्रश्नयो गी स्क्राचार्यन्प्राशमाम्यहम्‌ ॥४९॥

विरजानन्दमाचार्य यतीन्द्रं तत्त्ववित्तममृप्प्रोकारणाएफी फी एाज्ासा5 अरज ॥०,॥ ।गणरी ही फक मप्रेषक्रेोगीमस्वाच्चार्यक्प्रक्षमाम्यहम्‌ ॥४२॥ आशारामं महासिद्धं हाथीरामेति विश्रुतिम्‌ [४ णीए काण्णीका छीन छएाएीछी ॥3/॥ एक शम्मतरक्रयोगी मरी स्स प्रणमाम्यहम्‌ ॥४३॥ रामभद्रं रामभक्तं तत्त्वज्ञानप्रबोधकम्‌ ' 2 PPTSFTRRBTSPEET Sr 75

II 9 | iF : स्वाचार्ये"प्रॅणमाम्यहम्‌ ॥४४॥ रघुनाथं तपोनिष्ठं रामतत्त्वोपदेशकभ्‌ 0086 ०7 शनीर्णाफालगएगाप्र ०3|| SYS DISTT aBIBF]) उफ ११९ _

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१८४ योगीन्द्रप्रणीता क्क: <<< जज भज

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥४६॥ राघवेन्द्रं गुरोः भक्तं जानकीप्रीतिभाजनम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥४७॥ वैदेहीवल्लभाचार्य रामतत्त्वविचारकम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥४८॥ कोसलेन्द्रं तपोनिष्ठं सदाचारप्रवर्धकम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥४९॥ रामकिशोरमाचार्य ब्रह्मतत््वविवेचकम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५०॥ श्रीजानकोनिवासाख्यं सीतातत्त्वविवेचकम्‌

| रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५१॥

श्रीसाकेतनिवासाख्यं वेदवेदान्तपारगम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५२॥ _ जानकीजीवनाचार्य जानकीतत्त्वकोविदम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५३॥ भरताग्रजमाचार्य रामतत्त्वरतं सदा रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५४॥ पूज्यं हनुमदाचार्य तपोनिष्ठ गुरोर्गुरुम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्य प्रणमाम्यहम्‌ ॥५५॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणां तत्त्वज्ञं तार्किकं वुधम्‌ |

शास्त्रसम्मतशास्त्रार्थ विरोधिजयिनं प्रभुम्‌ ॥५६॥ सर्वज्ञं सम्प्रदायस्य स्थितिस्थापनकारिणम्‌ ।:

सर्वदा शिष्यनिचयैः भूषितं भूपतिप्रियम्‌ ॥५७॥ विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तनिष्णातं पण्डितं सदा

सीतारामजपे लीनं वैष्णवानन्दवर्धकम्‌ ॥५८॥ गुरुं रघुवराचार्यमज्ञानध्वान्तवारकम्‌

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्यं प्रणमाम्यहम्‌ ॥५९॥

रामप्रपन्नयोगीन्द्रः स्वाचार्यस्तुतिचन्द्रिकाम्‌ | समर्पयामि निर्माय स्वाचार्यचरणेषु वै ॥६०॥

श्रीरामः शरणं मम फू...

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